Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 42, Verse 9
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 42, verse 9 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 42 · श्लोक 9
संस्कृत श्लोक
यथोल्लसति भाश्चक्रैः कचन्कनकसागरः ।
तथात्मनि परिस्पन्दैः स्फुरत्यक्षैश्चिदर्णवः ॥ ९ ॥
हिन्दी अर्थ
परमार्थतः अन्यरूप होते हुए भी कल्पित अन्यरूप से स्फुरणो में भी यही दृष्टान्त है, इस आशय से
कहते है।
जैसे शरद् ऋतु की धूप से चमक रहा पिघलाए हुए सोने के समान सागर स्फुरित होता है, वैसे ही
चैतन्यरूपी सागर इन्द्रियजन्य प्रकाशो से आत्मा में ही स्फुरित होता है