Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 42, Verse 17
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 42, verse 17 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 42 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
चिदेवैतदवस्त्वेव व्यतिरिक्ता तथात्मनः ।
अनन्ता तद्गतैवाशु लहरीव महार्णवात् ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
इस प्रकार चित् मे कल्पित सकल दृश्य का चिन्मात्रत्व ही परमार्थरूप है, यो फलित हुआ, ऐसा
कहते हैं।
सद्रूप आत्मा से पृथक् कल्पना अवस्तु ही है, इसलिए जैसे महासागर से व्यतिरिक्त लहरी
महासागररूप ही है, वैसे ही शीघ्र परमात्मा में प्राप्त हुई अनन्त कल्पना चित् ही है