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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 42, Verses 30–31

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 42, verses 30–31 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 42 · श्लोक 30

संस्कृत श्लोक

इच्छाद्याः शक्तयश्चेतो गावो वृषमिवोन्मदम् । अनुधावन्ति दोषाय सरितः सागरं यथा ॥ ३० ॥ इति शक्तिमयं चेतो घनाहंकारतां गतम् । कोशकारक्रिमिरिव स्वेच्छया याति बन्धनम् ॥ ३१ ॥

हिन्दी अर्थ

उक्त विषयो मे आसक्ति होने पर उन विषयों का पुनःपुनः स्मरण करता हुआ चित्तभाव को प्राप्त हुआ चैतन्य राग, द्वेष आदि दोषों से अभिभूत होता है, ऐसा कहते हैं । जैसे गौएँ मदोन्मत्त साँड के पीछे पीछे दौड़ती हैं और जैसे नदियाँ सागर की ओर दौड़ती हैं वैसे ही इच्छा आदि शक्त्यो दोष के लिए ही चित्त का अनुगमन करती हैं