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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 42, Verses 39–50

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 42, verses 39–50 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 42 · श्लोक 39-50

संस्कृत श्लोक

तदेतदाबद्धमिह चित्तं राघव दुःखितम् । तृष्णाशोकसमाविष्टं रागायतनमाततम् ॥ ३९ ॥ जरामरणमोहान्तर्भवभावनयाहतम् । ईहितानीहितैर्ग्रस्तमविद्यारागरञ्जितम् ॥ ४० ॥ इच्छासंक्षुभिताकारं कर्मवृक्षवनाङ्कुरम् । सुविस्मृतोत्पत्तिपदं कल्पितानर्थकल्पितम् ॥ ४१ ॥ कोशकारवदाबद्धं शोकाकारपदं गतम् । तन्मात्रवृन्दावयवमनन्तनरकातपम् ॥ ४२ ॥ स्वदृश्यमपि शैलेन्द्रसमभारभयावहम् । जरामरणशाखाढ्यं संसारविषदुर्द्रुमम् ॥ ४३ ॥ इमं संसारमखिलमाशापाशविधायकम् । दधदन्तः फलैर्हीनं वटधाना वटं यथा ॥ ४४ ॥ चिन्तानलशिखादग्धं कोपाजगरचर्वितम् । कामाब्धिकल्लोलहतं विस्मृतात्मपितामहम् ॥ ४५ ॥ मृगं यूथादिव भ्रष्टं शोकोपहतचेतनम् । पतङ्गकमिव ज्वालादग्धं विषयपावके ॥ ४६ ॥ छिन्नमूलमिवाम्भोजं परमां म्लानिमागतम् । छिन्नाङ्गमात्मनः स्थानाद्विशेषासङ्गदुःस्थितम् ॥ ४७ ॥ विषयादिषु मध्यस्थं चित्ररूपेषु शत्रुषु । दशास्वेतास्वनन्तासु लुठितं संकटास्विति ॥ ४८ ॥ दुःखे निपतितं घोरे विहङ्गः सागरे यथा । स्वबन्धास्थं जगज्जाले शून्ये गन्धर्वपत्तने ॥ ४९ ॥ उह्यमानमनास्थाब्धौ मनो विषयविद्रुतम् । उद्धरामरसंकाश मातङ्गमिव कर्दमात् ॥ ५० ॥

हिन्दी अर्थ

यूथ से विड हुए मृग के समान शोक से अचेत हुए, विषयरूपी अग्नि में पतंगे के समान ज्वालाओं से जले हुए, जिसकी जड कट गई हो, ऐसे कमल की तरह अत्यन्त म्लानता को प्राप्त हुए, अपने निवासभूत देह से मृत्यु द्वारा अपहरण करने पर तत्‌ तत्‌ देहो के अभिमान के विच्छेद से छिन्न-भिन्न अंगवाले, अतएव तत्‌-तत्‌ देहो मेँ आसक्ति से अत्यन्त पीडित एवं विषय, इन्द्रिय, देह आदिरूप भाँति-भाँति के रूप धारणकर अपने विनाश में तत्पर हुए शत्रुओं के मध्य में उन पर विश्वास करने के कारण स्थित, पहले कही गई संकटाकीर्ण इस अनन्त दशाओं में भटके हुए, जैसे पक्षी सागर में गिरा हो वैसे ही घोर दुःख में गिरे हुए, गन्धर्व नगर के तुल्य शून्य इस जगज्जाल में अपने बन्धन के हेतुभूत देह आदिपर अत्यन्त स्नेह करनेवाले, तत्त्वज्ञान ओर उसके साधने के अनादररूपी समुद्र मे तैर रहे एवं विषय- वासना से पीडित मन का हे देवतुल्य श्रीरामचन्द्रजी ! कीचड़ से हाथी से समान, आप उद्धार कीजिए