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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 42, Verse 1

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 42, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 42 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । कुपितस्यासतोऽप्यस्य प्रेक्षामात्रविनाशिनः । अविद्याविततव्याधेरौषधं श्रृणु राघव ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

यह उत्पन्न होकर प्रोढता को प्राप्त हुई है, इसने दोष के लिए ही अपने आकार का विस्तार किया है, इसका बलपूर्वक विनाश कीजिए, तब आप इसे जानेंगे ॥ ३ ५॥ तो स्वाप्निक पुरुष के वध के उद्योग की भाँति अविद्या की निवृत्ति में यत्नातिशय निष्फल है ? ऐसी आशंका करके उससे विलक्षण अनर्थप्रबलता का वर्णन करते हैं। अत्यन्त बुद्धिमान तथा साथ ही साथ शूर भी ऐसे पुरुष तीनों लोकों में नहीं हैं, जो अविद्या द्वारा विवश न किये गये हों ॥ ३ ६॥ इसलिए रोग के तुल्य स्वभाववाली इस अविद्या के विनाश के लिए प्रयत्न कीजिए । इससे यह अविद्या फिर आपको जन्मयातनाओं में नियुक्त न करेगी ॥ ३ ७॥ सम्पूर्ण आपत्तियों की मुख्य सहचरी, अज्ञानरूपी वृक्ष की मंजरी तथा अनर्थसमूहों की जननी इस अविद्या को उखाड़ फेंकिए ॥ ३ ८॥ उक्तार्थ उपसंहार कहते हैं। भय, विषाद, दुष्ट मनोव्यथा तथा विपत्तियों को देनेवाली, हृदय में स्थित आत्मदृष्टि के मोहरूपी अन्धकार के हेतु महापटलरूप शरीर, इन्द्रिय आदि की हेतुभूत इस अविद्या को बलपूर्वक अच्छी तरह हटाकर आप भवसागर के पार को प्राप्त होईए ॥३ ९॥ इकतालीसवाँ सर्ग समाप्त बयालीसवाँ सर्ग अनन्तशक्ति ब्रह्म के, वासना की घनता के क्रम से, जीवभाव क्रम का वर्णन । इस प्रकार अविद्यारूप व्याधि का वर्णन कर उसकी निवृत्ति के उपाय को अग्रिम बहुत से सर्गो से कहने के लिए श्रीवसिष्ठजी प्रतिज्ञा करते हैं । श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे रघुवर, असत्‌ अतएव विचारमात्र से नष्ट होनेवाली इस अत्यन्त प्रकोप को प्राप्त हुई अविद्यारूपी विस्तृत व्याधि की औषधि सुनिये