Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 42, Verses 28–29
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 42, verses 28–29 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 42 · श्लोक 28,29
संस्कृत श्लोक
जीवोऽहंकारतां प्राप्तस्त्वहंकारश्च बुद्धिताम् ।
संकल्पजालकलितां मनस्तां बुद्धिरागता ॥ २८ ॥
मनो हि संकल्पमयं संस्थाग्रहणतत्परम् ।
प्रतियोगिव्यवच्छिन्नप्राप्तिसत्यैरपीहितैः ॥ २९ ॥
हिन्दी अर्थ
इस प्रकार क्षेत्र सिद्धि कह कर जीव का अहंकार आदि क्षेत्र में तादात्म्यसंगध्यासरूप बन्धक्रमसे
कहते हैं।
जीव अहंकारता को प्राप्त होता है । अहंकार बुद्धिता को प्राप्त होता है । बुद्धि संकल्प-विकल्प
जालों से पूर्ण चित्तता को प्राप्त होती है। चित्त स्त्री, पुत्र आदि के शरीराकार के ग्रहण में यानी तदाकार
वृत्ति द्वारा संस्काररूप से धारण में तत्पर, संकल्प-विकल्पमय एवं सफल और विफल मनोरथों से
परिच्छिन्न तुच्छ विषयों मेँ आसक्त होता हे