Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 42, Verses 23–25
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 42, verses 23–25 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 42 · श्लोक 23-25
संस्कृत श्लोक
वासनां कलयन्सोऽपि यात्यहंकारतां पुनः ।
अहंकारोऽपि निर्णेता कलङ्की बुद्धिरुच्यते ॥ २३ ॥
बुद्धिः संकल्पकलिता प्रयाति मनसः पदम् ।
मनो घनविकल्पं तु गच्छतीन्द्रियतां शनैः ॥ २४ ॥
पाणिपादमयं देहमिन्द्रियाणि विदुर्बुधाः ।
दहोऽसौ ज्ञायते लोके सूयतेऽपि च जीवति ॥ २५ ॥
हिन्दी अर्थ
वासनाओ की कल्पना करता हुआ वह कषेत्रज्ञ अहंकारता को प्राप्त होता है।
निश्चय करनेवाला अतएव अन्य कल्पनारूप कलंक से युक्त अहंकार ही बुद्धि कहलाता है ।
संकल्पयुक्त बुद्धि मन का स्थान ग्रहण करती हे । प्रचुर विकल्पों से युक्त मन धीरे-धीरे इन्द्रियता को
प्राप्त होता है, इन्द्रियों को ही विद्वान लोग, हस्त, पाद आदि रूप देह कहते हैं, यह शरीर लोक में जाना
जाता है, उत्पन्न होता है ओर जीवित रहता हे