Sthiti Prakarana (Existence) · Sarga 40
उनतालीसवाँ सर्ग समाप्त चालीसवाँ सर्ग विविध जीवों की उपाधियों द्वारा उत्पत्ति, जीवों तथा उनकी उपाधियों के ब्रह्मभाव का विस्तार से वर्णन ।
36 verse-groups
- Verse 1श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : हे प्रभो, ब्रह्मपद से इन जीवों की उत्पत्ति कैसे हुई, वह कितनी और…
- Verses 2–3यद्यपि जीवों की उत्पत्ति उत्पत्ति प्रकरण में विस्तार से कही गई है, तथापि आगे किये जाने वा…
- Verse 4परत्रह्म की निर्मल चित्शक्ति, जो सर्वशक्तिशालिनी है अपनी इच्छा से विविध कल्पना करती हुई…
- Verse 5पूर्वोक्त देहादि के आकार का ही अच्छी तरह जो अहंभाव से स्फुरण है, उसके द्वारा घनता को प्रा…
- Verse 6मन के संकल्पमात्र से दृश्य अहंकार आदि की कल्पना द्वारा वास्तविक दृग्रूपता का त्यागकर रही-…
- Verse 7इससे क्या हुआ ? यह कहते हैं। यद्यपि चिद्रूप आत्मा स्वप्रकाश है, तथापि वह सर्वप्रथम अपने स…
- Verse 8उस आकाश में ब्रह्मा आदि की स्थूल देह की और भुवनो की कल्पना दशति हैं। वह चित्तत्त्व ब्रह्म…
- Verse 9हे श्रीरामचन्द्रजी, चौदह भुवनों में रहने के कारण चौदह प्रकार के अनन्त भूत समूहों के कोलाह…
- Verse 10इस तरह उपाधि की उत्पत्ति के मिथ्या होने से उपाधि प्रयुक्त जीवों की उत्पत्ति भी मिथ्या है,…
- Verse 11उसमें शास्त्र के अधिकारी दुर्लभ हैं, यह दशनि के लिए जीवों का तीन प्रकार से विभाग करते हैं…
- Verse 12शास्त्र के अधिकार का प्रयोजक वैराग्य कहाँ सुलभ है ? उसको कहते है । पृथिवी में सम्बन्ध रखन…
- Verse 13उनके वैराग्य होने में हेतु बतलाते हैं। उन नरजातियों के मध्य में कुछ मनोव्यथा से पीडित, दु…
- Verse 14जो अमृत, सर्वव्यापक, निरामय, भ्रमस्पर्शशून्य, अकारण और अनन्त नामवाला ब्रह्म है, वह जिस तर…
- Verse 15निश्चल समुद्र में चंचल तरंगों की चंचलता की भाँति स्पन्दनशून्य शरीरवाले उस परमात्मा का जो…
- Verse 16स्पन्दः सत्तैकदेशत:” यह जो कथन है, वह अयुक्त है, क्योकि अखण्ड पूर्णसत्तैकरस ब्रह्म में सत…
- Verse 17जीव-ब्रह्म की एकता की वास्तविकता के व्युत्पादन के लिए उत्पत्ति, स्पन्द ओर एकदेश आदि का व्…
- Verse 18वस्तुतः क्यों नहीं है ? इस पर कहते हैं। प्रत्यक्ष उत्पद्यमानरूप से दिखाई दे रहे भी विकारि…
- Verse 19यदि उसमें इनका सम्भव नहीं है, तो जगत के किसी अन्य मूल की कल्पना कीजिए। इस पर कहते हैं । उ…
- Verse 20जो-जो कल्पनाएँ हैं, जो पदार्थ हैं, जो शब्द हैं और जो वाक्यार्थ हैं, वे सत् से उत्पन्न हो…
- Verse 21इस तरह सत्ता के भेद के अभाव से भेदप्रतीति मिथ्या ही है, ऐसा कहते हैं। अग्नि से उत्पन्न हु…
- Verse 22दीपक से दीपक की भाँति यह जगत उत्पन्न है, यह व्यवहार कैसे है ? इस पर कहते हैँ । यह इससे उत…
- Verse 23यह जगत भिन्न है, यह ब्रह्म भिन्न है, यह शब्द ओर अर्थ का व्यवहारश्रम वचनमात्र में है, परमा…
- Verse 24पूर्वोक्त क्रियाशक्ति से उत्पन्न हुई मनःशक्ति से ही स्वभावतः शब्दविभाग प्रवृत्त होता है,…
- Verse 25पूर्वोक्ति अर्थ को ही उदाहरण देकर दशतिहै। अग्नि की एक शिखा की दूसरी शिखा जनक हे, यह कथन व…
- Verse 26परमात्मा मेँ जन्य-जनक आदि शब्दव्यवहार का सम्भव नहीं हे । अनन्त होने के कारण जब वह एक ही ह…
- Verse 27यह उक्ति का स्वभाव है कि एक उक्ति के अनन्तर दूसरी उक्ति स्वाश्रयविरुद्ध भेद, द्वित्व आदि…
- Verse 28समुद्र में तरंग- समूह की भाँति परब्रह्म मे जो शब्द ओर अर्थ की कल्पना का आकार है, वह ब्रह्…
- Verse 29ब्रह्म ही प्रत्यगात्मा है, ब्रह्म ही मन है, विविध प्रकार की बुद्धिवृत्तियाँ भी ब्रह्म ही…
- Verse 30सामने दीख रहा यह सब विश्व ब्रह्म ही है, वह ब्रह्मपद विश्व से परे है । वस्तुतः यह जगत है ह…
- Verses 31–32आत्माकाश में यह भिन्न हे, यह भिन्न हे, यह विभाग मिथ्याज्ञान के विकल्प से कथनमात्र हे । इस…
- Verse 33से दूसरी अग्नि की शिखा उत्पन्न हुई वैसे ही ब्रह्म से मन की संज्ञारूप शिखा उत्पन्न हुई है…
- Verse 34सर्वस्वरूप, सर्वव्यापक उस अनन्त ब्रह्मपद से अन्य कुछ नहीं उत्पन्न हो सकता है, जो कुछ उत्प…
- Verse 35इस जगत में ब्रह्मतत्त्व से अतिरिक्त कुछ उत्पन्न नहीं होता, इसलिए यह सब ब्रह्म ही है, यही…
- Verses 36–37हे मतिमान श्रीरामचन्द्रजी, जब आपका सिद्धान्त प्राय: ऐसा ही होगा, तभी हम सिद्धान्तअर्थ की…
- Verse 38इस परमार्थता में अविद्या आदि कोई इतर पदार्थ विद्यमान नहीं हैं तत्-तत् वस्तुविषयक तत्तद्…
- Verse 39पूर्व में कहे गये सभी पदार्थो का उपसंहार करते है । हे श्रीरामचन्द्रजी, आपकी अज्ञानदूषित द…