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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 40, Verse 5

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 40, verse 5 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 40 · श्लोक 5

संस्कृत श्लोक

कलनाद्धनतामेत्य यत्किंचिदपि सा स्वयम् । संकल्पयति पश्चात्तत्तत्तामेति मनःपदम् ॥ ५ ॥

हिन्दी अर्थ

पूर्वोक्त देहादि के आकार का ही अच्छी तरह जो अहंभाव से स्फुरण है, उसके द्वारा घनता को प्राप्त हुई वह चित्‌शक्ति स्वयं जो कुछ भी संकल्प करती है, फिर उस भाव को प्राप्त हो जाती है। वही चित्‌शक्ति का घनीभाव मन तथा जीवोपाधि है