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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 40, Verse 22

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 40, verse 22 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 40 · श्लोक 22

संस्कृत श्लोक

अयमस्मात्समुत्पन्न इतीयं या जगत्स्थितिः । आधिक्यं तत्क्रियाशक्तौ जन्यं जनकमेव वा ॥ २२ ॥

हिन्दी अर्थ

दीपक से दीपक की भाँति यह जगत उत्पन्न है, यह व्यवहार कैसे है ? इस पर कहते हैँ । यह इससे उत्पन्न हे, यह जो जगत की स्थिति है, वह एक दीपक की दो रूपों के निर्माण की शक्ति मेँ अतिशय की भाँति माया से एक ही आत्मा की दो रूपों के निर्माण की शक्ति मेँ अतिशय है, वही जन्य-जनक दो रूपों मे भासित होता हे