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Sthiti Prakarana (Existence) · Sarga 36

पैंतीसवाँ सर्ग समाप्त छत्तीसवाँ सर्ग अपने-आप स्थित असक्त ही चित्‌ की सर्वत्र स्थिति है तथा चित्‌ की ही सर्वत्र स्थिति से संपूर्ण पदार्थो की स्थिति है, उनकी पृथक्‌ स्थिति नहीं है, यह वर्णन |

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  1. Verse 1अब जगत स्थितिरूप प्रकरण के मुख्य अर्थ को जानने के लिए श्रीरामचन्द्रजी पूछते है । श्रीरामच…
  2. Verse 2ब्रह्मसत्ता से ही जगत की स्थिति है, उसकी पथक्‌ सत्ता नहीं है । प्राणियों को पृथक्‌ अपनी स…
  3. Verse 3जब आत्मस्थिति से ही सबकी स्थिति है, तो आत्मा का सर्वत्र दर्शन क्यो नहीं होता ? ऐसी शंका ह…
  4. Verse 4जैसे मणि के अन्दर प्रतिबिम्ब भली-र्भोति स्थित-सा चारों ओर प्रतीत होता है, वह न तो सत्य है…
  5. Verse 5जैसे अपने आधारभूत और अपने में स्थित मेघों से आकाश स्पृष्ट नहीं होता वैसे ही चित्‌ में स्थ…
  6. Verse 6यदि कोई कहे ऐसी अवस्था में सूक्ष्म चिति घट आदि की तरह देह मे भी नहीं दिखाई देनी चाहिये; प…
  7. Verse 7ॐ भूतेन्द्रिय मनोबुद्धिवासनाकर्मवायवः । अविद्या चाष्टकं प्रोक्तं पुर्यष्टमृषिशत्तमैः ॥ पु…
  8. Verse 8चिति की सूक्ष्मता और स्वच्छता का विचार करने पर आकाश भी उसकी अपेक्षा सौगुना स्थूल ओर सौगुन…
  9. Verses 9–10इसीलिए उसमें भ्रान्ति से देखे गये भावों के विकार पृथक्‌ नहीं हैं, ऐसा कहते हैं । जैसे जलर…
  10. Verse 11चिति विषय की अभिवृद्धि करती है, ऐसा यदि मानते हो, तो चिति चिति की वृद्धि करती है, ऐसा समझ…
  11. Verse 12उसी चिति को ज्ञानी ओर अज्ञानी की कल्पना से फिर विभाग करके कहते है। अज्ञानियो मेँ यह चिति…
  12. Verse 13वही चिति जगत को प्रकाश, भोग ओर जन्म देनेवाली है, ऐसा कहते है । उस चित्तत्त्व का दूसरा नाम…
  13. Verse 14अज्ञानियों की दृष्टि से जन्‍म आदि की निमित्त होने पर ज्ञानियों की दृष्टि से वह कूटस्थ अपर…
  14. Verse 15यह निर्मल चिति स्वयं अपने स्वरूप में स्थित हे । हे श्रीरामचन्द्रजी, इस प्रकार जगतनामक प्र…
  15. Verse 16चिति का विवर्त भी परमार्थद्रष्टि से चिद्रूप ही है, इस आशय से दो दृष्टान्त कहते है । जैसे…
  16. Verses 17–20स्वतः शुद्ध का अविद्या द्वारा सर्गश्रमरूप से परिस्फुरण ही सृष्टि कर्तृत्व है, अन्य प्रकार…
  17. Verses 21–22पृथ्वी के अंकुररूप से बढ़ने में अन्य आकाशादि भूतो के रूप से वही अनुकूलता का आचरण करता है,…
  18. Verse 23पुष्पो में धीरे-धीरे केसर का संचय कर चित्तत्त्व ही गन्धता को प्राप्त होता है । मिट्टी के…
  19. Verse 24मूल में स्थित सुन्दर रसभाव को प्राप्त हुआ चित्तत्त्व ही फलरूपता को प्राप्त होता है वैसे ह…
  20. Verse 25इन्द्रधनुष के वृक्षों में नवीनता का सम्पादन करता हुआ वह चित्तत््व ही अवयवों से ओर समूह से…
  21. Verses 26–28ऋतु के रूप से भी चित्तत्व ही कार्यो पर अनुग्रह करता है, ऐसा दशति है । फूल ओर पल्लवो की रा…
  22. Verse 29वर्ष, युग आदिरूप से भी वित्तत्व ही सृष्टि आदि की मर्यादा रखता है, ऐसा कहते हैँ । वर्ष आदि…
  23. Verse 30नियति आदिरूप से भी वही (चित्तत्व ही) जगत की मर्यादा का स्थापन करने वाला है, ऐसा कहते हैं…
  24. Verses 31–32चौदह भुवनों के अन्दर चोदह प्रकार के प्राणी, जिनके विविध प्रकार के आचार-व्यवहार हैं और विव…
  25. Verse 33पूर्वोक्त अर्थ का ही विस्तारपूर्वक उपसंहार करते हैं। पूर्वजन्म के संकल्पों की वासनाओं के…