Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 36, Verses 31–32
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 36, verses 31–32 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 36 · श्लोक 31,32
संस्कृत श्लोक
चतुर्दशविधानीह भूतानि भुवनान्तरे ।
नानाचारविहाराणि नानाविरचनानि च ॥ ३१ ॥
पुनःपुनर्विलीयन्ते जायन्ते च पुनःपुनः ।
धारापरम्परा याति विना वारीव बुद्बुदाः ॥ ३२ ॥
हिन्दी अर्थ
चौदह भुवनों के अन्दर
चोदह प्रकार के प्राणी, जिनके विविध प्रकार के आचार-व्यवहार हैं और विविध रचनाएँ हैं, पुन:-पुनः
लीन होते हैं और पुन:-पुनः उत्पन्न होते हैं । तत्त्वज्ञान से प्राणियों की जन्म-मरणप्रवाह परम्परा ऐसे
दूर होती है, जैसे कि जल के बिना बुदबुद