Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 36, Verse 11
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 36, verse 11 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 36 · श्लोक 11
संस्कृत श्लोक
चिच्चिनोति चितं चेत्यं तेनेदं स्थितमात्मनि ।
अज्ञेऽज्ञे त्वन्यदायातमन्यदस्तीति कल्पना ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
चिति विषय की अभिवृद्धि करती है, ऐसा यदि मानते हो, तो चिति चिति की वृद्धि करती है, ऐसा
समझो, क्योंकि चेत्य (विषय) कोई अतिरिक्त पदार्थ नहीं हे । इस प्रकार मनन करने से चिति का अपने
में व्यापार न होने से यह चित्स्वरूप आत्मा में ही स्थित है कुछ अभिवृद्धि नहीं करता, ऐसा निष्कर्ष
निकलता है, यह परमार्थ दृष्टि है। जो अज्ञानी होता हुआ भी अपने को ज्ञानी समझता है, उसीकी दृष्टि
से सृष्टियों में चित् से अतिरिक्त प्राप्त हुआ था ओर है, ऐसी कल्पना हे