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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 36, Verse 8

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 36, verse 8 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 36 · श्लोक 8

संस्कृत श्लोक

आकाशशतभागाच्छा ज्ञेषु निष्कलरूपिणी । सकलाकलसंसारस्वरूपैकात्म्यदर्शिनी ॥ ८ ॥

हिन्दी अर्थ

चिति की सूक्ष्मता और स्वच्छता का विचार करने पर आकाश भी उसकी अपेक्षा सौगुना स्थूल ओर सौगुना मलिन प्रतीत होता है, इस प्रकार विद्वानों के अनुभव से कहते है । ज्ञानियों के अनुभव में तो सारे संसारस्वरूप को निष्कल बनानेवाला, एकात्म्यदर्शनशील आकाश से भी सौगुना स्वच्छ वह चित्तत्त्व निष्कलरूपी ही है