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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 36, Verse 30

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 36, verse 30 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 36 · श्लोक 30

संस्कृत श्लोक

नियतिः स्थितिमायाति स्थैर्यचातुर्यकारिणी । तिष्ठत्याप्रलयं धीरा धराधरणधर्मिणी ॥ ३० ॥

हिन्दी अर्थ

नियति आदिरूप से भी वही (चित्तत्व ही) जगत की मर्यादा का स्थापन करने वाला है, ऐसा कहते हैं । स्थिरता रूप चतुरता को करनेवाली नियतिरूप से वही स्थिति को प्राप्त होता है। उसी के कारण सब जनों की आधारभूत और धीर पृथिवी प्रलय तक स्थिर रहती है