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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 36, Verses 17–20

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 36, verses 17–20 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 36 · श्लोक 17-20

संस्कृत श्लोक

तत्स्वभावेन चिन्नाम्ना सर्वगेनोदितात्मना । प्रकाशेनाप्रकाशेन निरंशेनांशधारिणा ॥ १७ ॥ स्वयं स्वकलनाभोगादनन्तं पदमुज्झता । अहमस्मीति भावेन गच्छता ज्ञपदं शनैः ॥ १८ ॥ नानातायां प्ररूढायामस्यां संसृतिपूर्वकम् । भावाभावग्रहोत्सर्गपदे स्थितिमुपागते ॥ १९ ॥ पुर्यष्टकस्पन्दशतैःकरोति न करोति च । उत्सेधमेति भूकोशकोटरस्थोऽङ्कुरोत्करः ॥ २० ॥

हिन्दी अर्थ

स्वतः शुद्ध का अविद्या द्वारा सर्गश्रमरूप से परिस्फुरण ही सृष्टि कर्तृत्व है, अन्य प्रकार की सृष्टिकर्तृता उसमें नहीं है, यह दशनि के लिए उसके उपयोगी दो रूप दिखलाते है । व्यवहारतः सर्वव्यापक, आत्मरूप से उदित हुए अतएव परमार्थतः प्रकाशरूप, मैं नहीं जानता हूँ इस प्रकार के व्यवहार से अप्रकाश एवं परमार्थतः निरंश ओर व्यवहारतः अंशधारी, अविद्या में अपने प्रतिविम्बरूप कृत्रिम वेष से अनन्त (परम अपरिच्छिन्न) स्वरूप का त्याग करते हुए “यह मैं हूँ” इस अभिमान से शनैः शनैः जीवपद को प्राप्त हो रहे चित्‌ नामवाले अपने स्वभाव से इस विभिन्नता के बद्धमूल होने पर, संसार के साथ-साथ यह है, यह नहीं हे, यह ग्राह्य है, यह त्याज्य है, इस प्रकार के इष्ट ओर अनिष्टो के ग्रहण और त्याग के स्थानभूत देहात्मभाव की स्थिति को प्राप्त होने पर सैकड़ों शरीरो से विहित ओर निषिद्ध कर्मो से भोग्य जगत को वह चित्तत्त्व बनाता है ओर वस्तुतः नहीं भी बनाता हे । वही चैतन्य पृथिवी के अन्दर स्थित अकरो के समूहरूप से वृद्धि को प्राप्त होता हे