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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 36, Verse 14

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 36, verse 14 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 36 · श्लोक 14

संस्कृत श्लोक

नास्तमेति न चोदेति नोत्तिष्ठति न तिष्ठति । न चायाति न वा याति न चेह नच नेह चित् ॥ १४ ॥

हिन्दी अर्थ

अज्ञानियों की दृष्टि से जन्‍म आदि की निमित्त होने पर ज्ञानियों की दृष्टि से वह कूटस्थ अपरिच्छिन्न एकरूप ही है, ऐसा कहते हैं। उक्त चित्तत्व न तो नाश को प्राप्त होता है, न उदित होता है, न उत्थान को प्राप्त होता हे, न स्थित होता है, न आता है, न जाता है, न यहाँ पर है और न यहाँ पर नहीं है, किन्तु सर्वत्र एक रूप से स्थित है