Sthiti Prakarana (Existence) · Sarga 28
सत्ताईसवाँ सर्ग समाप्त अड्डाईसवाँ सर्ग विश्राम को प्राप्त हुए देवता ओर दानवो का, वासनोदय होने तक चिरकालीन युद्ध का पुनः विस्तार से वर्णन ।
29 verse-groups
- Verse 1श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, जैसे समुद्र की तरंग तीर भूमि के तट पर शब्द करके…
- Verse 2जैसे वायु कमलों की सुगन्ध लेकर अपनी-अपनी अभिमत वनपंक्तियों को जाते हैं, वैसे ही देवता लोग…
- Verse 3जैसे भ्रमर सुन्दर कमलो पर विश्राम करते हैं, वैसे ही देवताओं ने स्थिर कान्तिवाले अपने सुन्…
- Verse 4अपना अभ्युदय करनेवाले किसी शुभ अवसर को पाकर देवताओं ने प्रलयकाल के मेघ की ध्वनि के सदुश ध…
- Verse 5दुन्दुभिघोष सुनकर दैत्यं के ऊपर आने पर अन्तरिक्ष में पातालवासी उन दैत्यों के साथ देवताओं…
- Verse 6सर्ग की समाप्ति तक युद्ध का ही वर्णन करते हैं। दोनों ओर से तलवार, बाण, शक्ति ओर मुद्गरो क…
- Verse 7माया से रचे गये आयुध ही जिसमें बड़ा भारी निबिड जल प्रवाह था, शीघ्र बहनेवाली, पत्थर, पर्वत…
- Verse 8पूर्वोक्त नदी का ही फिर वर्णन करते हैं। जिसके मध्यप्रवाह मेँ उल्मुक (अधजली लकड़ियाँ), त्र…
- Verse 9अब चुर और असुरों को परस्पर मोह में डालने के लिए विचित्र माया निर्माण, प्रतीकारों से उसकी…
- Verse 10उस युद्ध में दिशाओं के मुख शेलसदृश हथियारों से तहस-नहस किये गये पर्वतो से पूर्ण, रक्तरूपी…
- Verse 11लोहमय आयुधरूपी सिहों की सृष्टि गिरी जिसमें चलाये हुए भाले, बाण, शक्ति, गदा, तलवार ओर चक्र…
- Verse 12ज्वालाएँ उगल रही नेत्रो की विषाग्नियों के सन्ताप समूह से उत्पन्न दिशाओं के दाह से युगान्त…
- Verse 13विविध शस्त्रास्त्रं की नदी के प्रवाहों से, जिन्होंने मेरु पर्वत को वेष्टित कर रख्खा था, ख…
- Verse 14सुर ओर असुरो का युद्ध भूमिरूप आकाश शूलरूपी अस्त्रो, शस्त्रों, मायारचित गरुडो से ओर उखाडकर…
- Verse 15गरुड़ारत्र से उत्पन्न हुए गरुडो से ओर उनकी गुड गुड़ ध्वनियों से व्याप्त आकाश में फैले हुए…
- Verse 16जैसे पर्वत के तट से पक्षी ऊपर को उडते हैं, वैसे ही दैत्य भूमितल से आकाश की ओर ऊपर को उठते…
- Verse 17जिनके शरीर में गड़े हुए ऊँचे-ऊँचे आयुधरूपी वृक्षों से बनी हुई वनपंक्तियों में महान अग्निद…
- Verse 18हे श्रीरामचन्द्रजी, मेरु पर्वत चारों ओर आकाश सुर ओर असुररूपी उत्तम पर्वतो के शरीरो से निक…
- Verses 19–20वे देव ओर असुर एक ही साथ एक दूसरे पर पर्वतो की वृष्टि, जल की वृष्टि, विविध भीषण आयुधो की…
- Verse 21परस्पर युद्धोत्साह का त्याग न कर रहे देवता ओर असुर परस्पर शरीरो को काटने के लिए व्यग्र, अ…
- Verse 22कटे हुए सिर, हाथ, भुजा ओर उरुओं के समूहों से, जो आकाश ओर दिशाओं में उत्पातसूचक टिड्डियों…
- Verse 23भलीभाँति छोड़े गये, सिंहनाद कर रहे योद्धाओं के टकराने से समर में टूट रहे तथा परस्पर के टक…
- Verse 24परस्पर आयुध शिला, पर्वत, वृक्षों की वर्षा से तथा मेरु के समान विशाल कठिन शरीरो के परस्पर…
- Verse 25जिसमें प्रचण्ड आँधी से नीचे जल ओर अग्नि क्षुब्ध थे तथा ऊपर सूर्य क्षुब्ध थे एसे दो कपालवा…
- Verse 26अपने सदुश विशाल ओर निबिड आयुधो से आहत अतएव खूब घूम रहे, घूमने में शब्द कर रहे, विशाल गुहा…
- Verse 27वायु से व्याप्त वन के पत्ते की नाई भीतर ही भीतर घूम रहे माया निर्मित नदी, समुद्र, योद्धा,…
- Verse 28मेरु पर्वत के नीचे के पर्वतां के सदृश परिमाणवाले अतएव मनुष्यादि के संचार के निरोधक होने स…
- Verse 29उस समय ब्रह्माण्ड की उदरगुहा निबिड घुंघुम ध्वनि से परिपूर्ण आकाशवाली, खून से धोये हुए पर्…
- Verse 30इन्द्रादि देवताओं के विस्तृत भय आदि का विकार करानेवाली (अविद्यापक्ष में त्रिविध परिच्छेद…