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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 28, Verse 22

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 28, verse 22 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 28 · श्लोक 22

संस्कृत श्लोक

छिन्नैः शिरःकरभुजोरुभरैर्भ्रमद्भिराकाशकाष्ठशलभैरशिवैस्तदानीम् । आसीज्जगज्जठरमभ्रभरैरिवोग्रैराभास्करस्थगितदिक्तटशैलजालम् ॥ २२ ॥

हिन्दी अर्थ

कटे हुए सिर, हाथ, भुजा ओर उरुओं के समूहों से, जो आकाश ओर दिशाओं में उत्पातसूचक टिड्डियों के तुल्य घूम रहे थे, मेघों की घटाओं की तरह सारा जगत का मध्यभाग, ऐसा हो गया कि उसमें सूर्य, दिशाओं के तट ओर शैल समूह ये सब के सब आच्छादित हो गये