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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 28, Verse 9

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 28, verse 9 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 28 · श्लोक 9

संस्कृत श्लोक

पृथ्व्यादिदारुणशरीरमपि प्रहारदानग्रहा गहनराशिशरीरकेव । मायोपशाम्यति सुरासुरसिद्धसन्ना मायाकृतिः पुनरुदेति नचैव सैव ॥ ९ ॥

हिन्दी अर्थ

अब चुर और असुरों को परस्पर मोह में डालने के लिए विचित्र माया निर्माण, प्रतीकारों से उसकी शान्ति, फिर उसके तुल्य अन्य मायाओं के निर्माण और उनके उपशम को कहते हैं। पृथिवीमयी, जलमयी, तेजोमयी, वायुमयी, आकाशमयी सी (जिसमें जैसे पृथ्वी घूमती-सी थी, गिरती-सी थी, तथा जिसमें लोग जल में डूबते से थे, अग्नि से जलाये-से जाते थे, वायु से उडते-से थे, महागर्तरूप आकाश में गिरते-से थे) माया ओर पिशाच आदि शरीरमयी-सी माया (जैसे पिशाचो के शरीर गिरते हैं, दौडते हैं, युद्ध करते हैँ, इस प्रकार की दारुण शरीरमयी माया), जिसमें दूसरे के प्रहारों का ग्रहण करना और स्वयं प्रहार करना बार बार होता था, ऐसी दूसरी माया तथा शत्रुओं से दुर्दमनीय ढेर की तरह बहुत्व को प्राप्त हुए प्रत्येक योद्धा के शरीर से युक्त, इस प्रकार की भी माया, ये सब मायाएँ प्रयुक्त हो, सुर, असुर ओर सिद्धो द्वारा प्रतीकारो से विनष्ट होकर शान्त होती थी, फिर वैसी ही माया उदित होती थी, वह क्या पहले उत्पन्न हुई माया ही है अथवा वह नहीं है, किन्तु अन्य ही है, यों यथार्थरूप से उसे जानना कठिन था