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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 28, Verse 21

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 28, verse 21 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 28 · श्लोक 21

संस्कृत श्लोक

देवासुराः समरसंभ्रममाकुलास्ते अन्योन्यमङ्गदलनाकुलहेतिहस्ताः । नागेन्द्रडिम्भपृतनापृथुपीठपेषैः कीर्णश्रियो नभसि बभ्रमुरक्षिपन्तः ॥ २१ ॥

हिन्दी अर्थ

परस्पर युद्धोत्साह का त्याग न कर रहे देवता ओर असुर परस्पर शरीरो को काटने के लिए व्यग्र, अस्त्रौ से युक्त हाथवाले होकर ऐरावत आदि दिग्गजों की सन्ततिरूप हाथियों की सेनाओं की बडी- बड़ी पीठो के सदृश विशालपीठों को पीसने की तरह पीडा करनेवाले बड़े भारी सामग्री के साथ सवारी करने से शोभा को प्राप्त होकर आकाश में घूमते थे