Utpatti Prakarana (Creation) · Sarga 95
चौरानबेवाँ सर्ग समाप्त पचानवेवों सर्ग अज्ञानीजनों के बोध के लिए न कि वस्तुतः कर्म ओर कर्ता की सहोत्पत्ति का आशंकापूर्वक समर्थन |
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- Verse 1कल्प के आरम्भ में ब्रह्म से ही सम्पूर्ण जीवजातियों का आविभावि होता है, इस कथन के बहाने ब्…
- Verse 2भगवान् ने भी श्रीमुखसे कहा है - न कर्तृत्विं कर्माणि लोकस्य सजति प्रभु: । न कर्मफलसंयोगं…
- Verse 3अतएव यह सृष्टिवाद अज्ञानी के संमत व्यवहारभरूमि में ही है, परमार्थपद में नहीं है ऐसा कहते…
- Verse 4न निरोधो न चोत्पत्तिर्न बद्धो न च साधकः । न मुमुक्षुर्न वै मुक्त इत्येषा परमार्थता ॥ (न प…
- Verses 5–6यदि ऐसा है, तो ऐसी अवस्थामें परमार्थका उपदेश देनेवाले शास्त्रमें अज्ञानियों की दृष्टिसे उ…
- Verse 7लोक में अभ्युपगम्यवाद (काल्पनिकवाद) बहुधा देखा जाता है, ऐसा कहते हैं। इस प्रकार लोक में अ…
- Verses 8–11ब्रह्म की उपादानता तो तीनो कालो में उसीमें उत्पन्न होकर लीन होने के कारण सिद्ध है, ऐसा कह…
- Verses 12–13हे रामचन्द्रजी, जैसे पुष्प ओर सुगन्धि अभिन्न हैँ वैसे ही पुरुष (कर्ता) और कर्म अभिन्न है…
- Verse 14उनकी उत्पत्ति में न कर्म हेतु है और न और कुछ हेतु है, क्योकि जव पहले कर्ता रहेगा तब न कर्…
- Verse 15तात्पर्य यह है कि कर्ता की अनादिता तो कही नहीं जा सकती, क्योकि कर्तृत्व को यदि स्वाभाविक…
- Verse 16इसी प्रकार सदाचार भी प्रमाण है, यह कहने के लिए सन्तो का लक्षण कहते हैं। जो अत्यन्त विशुद्…
- Verse 17पूर्वोक्त लक्षणवाले सन््तों का सदाचार और श्रुतिस्मृतिरूप शास्त्र ये दो ही जिन्हें आत्मतत…
- Verses 18–19जो पुरुष स्वर्ग और मोक्ष के उपयोगी सम्यग् व्यवहार के लिए शास्त्रका अनुसरण नहीं करता, उसक…
- Verses 20–21बीज और अंकुर के सदृश कर्म से कर्ताकी सृष्टि होती है और कर्ता से कर्म का निर्माण होता है,…
- Verse 22कर्म के समान प्राक्तन वासना भी कर्ता की उत्पत्ति में हेतु है, ऐसा कहते हैं। जिस वासना से…
- Verse 23इस प्रकार भूमि का रचकर कर्ता और कर्म की साथ साथ उत्पत्ति होती है, इस पक्षपर आक्षेप करते ह…
- Verse 24भगवन्, आपने इस सहोत्पत्ति पक्षसे इन जीव और कर्मो की जगत् में प्रमाणो द्वारा प्रसिद्ध पर…
- Verses 25–26अद्वय होने के कारण अपने से अतिरिक्त कारणशून्य मायाशबल ब्रह्ममें आकाश आदि से लेकर स्थूलदेह…
- Verse 27भगवन्, इसलिए आप यथार्थतः मुझसे कहिए कि किया हुआ कर्म फलरूप से अवश्य परिणत होता है या नही…
- Verse 28इस प्रकार रामचन्द्रजीके आक्षेप करने पर प्रामाणिक आक्षेप की प्रशंसा करते हुए उसके समाधान क…
- Verse 29सहोत्पत्ति पक्षमें भी (कर्ता और कर्मकी साथ उत्पत्ति होती है, इस पक्षमे भी) जैसे कोई दोष न…
- Verses 30–34मन के विकास के बाद ही फल होता है, यह जो कहा था, उसे उदाहरण द्वारा दशति हैं। आदि सृष्टि मे…
- Verse 35इस प्रकार कर्ता और कर्म के अभेद कथन से भी कर्म मनोधर्म ही है, आत्मधर्म नहीं है । यदि कर्म…
- Verse 36कर्म का नाश होने पर मनका नाश हो जाता हे, मनका नाश होने पर कर्मका अभाव हो जाता है । योग से…
- Verses 37–38अग्नि और उष्णताकी भाँति सदा अभेद से मिले हुए दोनों में से-चित्त और कर्म में से-एक का अभाव…