Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 95, Verse 1
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 95, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 95 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
अभिन्नौ कर्मकर्तारौ सममेव परात्पदात् ।
स्वयं प्रकटतां यातौ पुष्पामोदौ तरोरिव ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
कल्प के आरम्भ में ब्रह्म से ही सम्पूर्ण जीवजातियों का आविभावि होता है, इस कथन के
बहाने ब्रह्म ही उपाधियो में जीवरूप से प्रविष्ट है, वह दशाया । ऐसी परिस्थिति मे आगन्तुक
जीवभावमें प्राक्तन कर्म हेतु नहीं कहा जा सकता, कारण कि प्राक्तन कर्म की सिद्धि तभी हो
सकती है जब प्राक्तन कर्ता रहेगा। प्राक्तन कर्ता की सिद्धि के लिए यदि जीवको अनादि मानें,
तो ब्रह्म के पूर्वॉक्त औपाधिक जीवभाव का समर्थन नहीं हो सकेगा, यों दोनों प्रकार ही प्राप्त
हुए दोषका दुष्टिभेद के अवलम्बन से परिहार करनेवाले गूढ़ आशयवाले श्रीवक्तिष्ठजी यौक्तिक
दृष्टि से कर्म ओर कर्ता की सहोत्पत्ति पक्ष को दशती हैं।
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स श्रीरामचन्द्रजी, जैसे वृक्ष से फूल और उसकी सुगन्धि साथ
ही साथ प्रकट होते हैं वैसे ही परस्पर अभेदकल्पना से अभिन्न आदिमें प्रकट हुए
सर्ग सन्दर्भ
चौरानबेवाँ सर्ग समाप्त पचानवेवों सर्ग अज्ञानीजनों के बोध के लिए न कि वस्तुतः कर्म ओर कर्ता की सहोत्पत्ति का आशंकापूर्वक समर्थन |