Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 95, Verses 12–13
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 95, verses 12–13 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 95 · श्लोक 12,13
संस्कृत श्लोक
पुष्पामोदाविवाभिन्नौ पुमान्कर्म च राघव ।
परमेशात्समायाते तत्रैव विशतः शनैः ॥ १२ ॥
दृष्टमेते जगत्यस्मिन्दैत्योरगनरामराः ।
उद्भवन्त्यभवा भावैः प्रस्फुरन्ति पुनः पुनः ॥ १३ ॥
हिन्दी अर्थ
हे रामचन्द्रजी, जैसे पुष्प ओर सुगन्धि अभिन्न हैँ वैसे ही पुरुष (कर्ता) और कर्म अभिन्न
है । ये परमात्मा से उत्पन्न हुए हैं और फिर उसीमें शनै:-शनै: लीन हो जाते हैं| ये दैत्य, नाग,
मनुष्य, देवता इस जगत् में वस्तुतः उत्पन्न न होते हुए भी वासनारूप भूतमात्रउपाधियों से
उत्पन्न होते हैं, और तुरन्त स्फुरित होते हँ यानी गमन आदि क्रिया से युक्त होते हैं । इससे
जन्म ओर कर्म की सहोत्पत्ति ओर अभेद प्रत्यक्ष दिखलाई देता हे