Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 95, Verses 5–6
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 95, verses 5–6 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 95 · श्लोक 5,6
संस्कृत श्लोक
काचिद्वा कलना यावन्न नीता राघव प्रथाम् ।
उपदेश्योपदेशश्रीस्तावल्लोके न शोभते ॥ ५ ॥
अतो भेददृशा दीनामङ्गीकृत्योपदिश्यते ।
ब्रह्मेदमेते जीवा वै वेति वाचामयं क्रमः ॥ ६ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि ऐसा है, तो ऐसी अवस्थामें परमार्थका उपदेश देनेवाले शास्त्रमें अज्ञानियों की दृष्टिसे
उपपन्न होनेवाले सृष्टि आदि के कथन का क्या प्रयोजन है ? उस पर कहते हैं ।
हे रामचन्द्रजी, जब तक कोई द्वितीय कल्पना प्रसिद्धि को प्राप्त न की जाय, तब तक लोकमें
उपदेश्य, उपदेशक ओर उपदेश शोभित नहीं होते। इसलिए भेददृष्टि से शोचनीय द्वैतकल्पना
का व्यवहारकाल तक-जब तक कि निश्चय से प्रमेय का निर्णय न हो जाय तब तक-संशय के
साथ अंगीकार कर यह ब्रह्म है ये जीव है, यों वाणीका उपदेश दिया जाता है