Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 95, Verse 35
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 95, verse 35 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 95 · श्लोक 35
संस्कृत श्लोक
कृष्णतासंक्षये यद्वत्क्षीयते कज्जलं स्वयम् ।
स्पन्दात्मकर्मविगमे तद्वत्प्रक्षीयते मनः ॥ ३५ ॥
हिन्दी अर्थ
इस प्रकार कर्ता और कर्म के अभेद कथन से भी कर्म मनोधर्म ही है, आत्मधर्म नहीं है ।
यदि कर्म आत्मधर्म माना जायेगा, तो उसके करटस्थ्तव स्वभावसे विरोध होगा, यह उसे मनो धर्म
कहने में तात्पर्य है, इसे दृष्टान्तपूर्वक दिखाते है ।
जैसे परस्पर अभिन्न पुष्प ओर सुगन्धिका भेद नहीं है वैसे ही परस्पर अभिन्न कर्म और
मनका भेद नहीं है ॥ ३ १॥
यदि कोड कटे कर्म शब्द का यज्ञ लिया जाता है, या उससे उत्पन्न अद्ृष्ट ? उनमें पहला
देह का धर्म है, दूसरा भोग्य मे समवाय सम्बन्ध से रहता है, ऐसी अवस्था में उसकी मनोधर्मता
कैसे ? इस पर कहते हैं।
इस जगत् में कर्मसंस्काररूप से मनमें स्थित क्रिया ही अदृष्ट के फलरूप से आविर्भूत होकर
देह, स्वर्ग, नरक आदिरूप होती है । इस प्रकार उस कर्म का आश्रय देह भी पहले मन ही था।
"सविज्ञानो भवति सविज्ञानमेवान्ववक्रामति' इस श्रुति से भावी देहाकारता के अभिमान को प्राप्त
हुए ही मन का पूर्व देह से उत्क्रमण सुना जाता है । आतिवाहिक (सूक्ष्म) देह की ही वासना के
बल से स्थूलदेहाकार में कल्पना होती है, ऐसा पहले कह आये हैं, इसलिए मन ही कर्म है ॥ ३ २॥
इस प्रकार तुम्हारे द्वारा कहा गया कर्मो की निष्फलता का दोष भी हट गया, क्योकि मनका
कार्यभूत सम्पूर्ण प्रपंच कर्मफल है, इस आशय से कहते हैं।
वह (ऐसा) कोई पर्वत नहीं है, वह कोई आकाश नहीं है, वह समुद्र नहीं है, वह लोक नहीं
है, जहाँ पर किये हुए अपने कर्मोका फल न हो ॥ ३ ३॥ सावधान होकर किया गया सांगोपांगरूप
से विराजमान कर्म चाहे वह ऐहिक हो चाहे प्राक्तन हो, पौरुष ही प्रयत्न है, वह कभी निष्फल
नहीं होता ॥३ ४॥
भाव यह है कि अविद्या से उत्पन्न हुआ मन ही क्रियाशक्तिसम्पन्न और वैतन्यरूप आत्मा
का उपाधि होने से कर्ता ओर भोक्ता है और वह “अन्नमयं हि सोम्य मनः“ (हे सौम्य, मन
अन्नमय है), तन्मनोऽकुरुत“ (उसने प्रष्टव्य के आलोचनके योग्य मन:शब्दवाच्य संकल्प
आदि रूप करण की रचना की), श्रीण्यात्मनेऽकुरुत मनो वाचं प्राणम्” (मन, वाणी और प्राण
इन तीन अन्नो की अपने लिए सृष्टि की) इत्यादि श्रुतियों से और पूर्वोक्त युक्ति से यद्यपि
प्रत्येक कल्पे और प्रतिदिन उत्पन्न होकर लीन होता है, तथापि प्रतिदिन आविर्भूत होकर
रात्रिमें छिप रही दीवार की छाया के समान तथा दर्पण को सामने से हटाने पर छिप रहे मुख के
प्रतिबिम्ब के समान वही यह है, इस प्रकार अबाधित प्रत्यभिज्ञारूप प्रमाण से ओर उपहित
आत्मा की एकता से उसका भेद नहीं होता, यों वह अनादि भी है । नाश शून्यतापत्ति नहीं है,
अथवा उत्पत्ति असत् की सत्ता नहीं है, जिससे कि प्रतिदिन सुषुप्ति में उसके नाश से भेद हो ।
सत्कार्यवाद का आश्रय लेने से अविद्या बीजरूप से विद्यमान ही प्राक्तन कर्ता ओर कर्म की
तथा उनके फल आकाश आदि की सहोत्पत्ति मानने पर भी कृतहानि और अकरत-प्राप्तिरूप
दोष की आपत्ति नहीं होती, न शास्त्र के प्रामाण्य का बाध होता है, अथवा न मात्स्यन्याय की
प्राप्ति होती है ओर न जन्म और कर्म की कार्यकारणताके नियम का खण्डन होता है ओर
तिरोभूत अवस्थावाला और आविरभूत अवस्थावाला मन ही अविद्या है, यह मानने से जीवों की
उत्पत्ति में परिशेष से एकमात्र अज्ञानको मैंने जो हेतु कहा है, वह भी विरूद्ध नहीं है । यदि क
कहे कि कर्ता ओर कर्म की सहोत्पत्ति ओर अभेद कहनेका फल क्या है 2
जैसे कृष्णता का क्षय होने पर काजल स्वयं क्षीण हो जाता है, चलनात्मक कर्म का नाश
होने पर मन का क्षय हो जाता है । भाव यह कि कर्म ओर मनमें से एक का विनाश चाहनेवाले
पुरुष को चलनात्मक प्राण के अथवा मनके निरोधरूप हठयोग या राजयोग का अभ्यास
करना चाहिए, यही उनका फल है