Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 95, Verses 25–26
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 95, verses 25–26 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 95 · श्लोक 25,26
संस्कृत श्लोक
ब्रह्मण्यकारणे ब्रह्मन्ब्रह्मादिषु फलेषु च ।
कर्मणां फलमस्तीति द्वयं लोके प्रमार्जितम् ॥ २५ ॥
संजाते संकरे लोके कर्मस्वफलदायिषु ।
मात्स्यन्याये विलसति नाश एवावशिष्यते ॥ २६ ॥
हिन्दी अर्थ
अद्वय होने के
कारण अपने से अतिरिक्त कारणशून्य मायाशबल ब्रह्ममें आकाश आदि से लेकर
स्थूलदेहपर्यन्त भोगायतन की सृष्टि कर्मो का फल है और उसके फलरूप (कार्यभूत) हिरण्यगर्भं
आदि स्थूल सूक्ष्म उपाधियों में भोग और उसकी सामग्रीकी सृष्टि फल है, यों लोकमें प्रसिद्ध
इन दोनों प्रवादों का आपने खण्डन कर दिया। कर्मो के निष्फल होने पर नरक आदिका भय न
होनेके कारण लोकमें सांकर्य (संकरता) होने पर जैसे बड़े मत्स्य छोटे मत्स्य को निगल जाते
हैं वैसे ही बलवानों द्वारा हीनबलों की हिंसा होगी, यों नाश ही अवशिष्ट रहेगा