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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 95, Verse 4

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 95, verse 4 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 95 · श्लोक 4

संस्कृत श्लोक

संप्रबुद्धजनाचारे वक्तुमेतन्न शोभनम् । यद्ब्रह्मण इदं जातं न जातं चेति राघव ॥ ४ ॥

हिन्दी अर्थ

न निरोधो न चोत्पत्तिर्न बद्धो न च साधकः । न मुमुक्षुर्न वै मुक्त इत्येषा परमार्थता ॥ (न प्रलय है, न उत्पत्ति है, न वद्ध (संसारी जीव) है, न साधक है, न मुमृश्च है ओर न मुक्त है, यह परमार्थता है ।) तद्तद्‌ बरह्मापूर्वमनपरमनन्तरमबाह्यमयमात्मा ब्रह्म सर्वानभू: इत्यादि श्रुति से लभ्य परमार्थ दृष्टि से तो न जयत्‌ की न जीवोंकी या कर्मो की उत्पत्ति आदि का प्रतिपादन किया जा सकता है । अथवा न उनके निषेधका ही प्रतिपादन किया जा सकता है, ऐसा कहते हैं। हे राघव, जहाँ पर ज्ञानी पुरुषों का व्यवहार है वहाँ यह ब्रह्म से उत्पन्न हुआ और यह उत्पन्न नहीं हुआ यह कथन शोभा नहीं देता है