Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 95, Verses 18–19
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 95, verses 18–19 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 95 · श्लोक 18,19
संस्कृत श्लोक
साधुसंव्यवहारार्थं शास्त्रं यो नानुवर्तते ।
बहिःकुर्वन्ति तं सर्वे स च दुःखे निमज्जति ॥ १८ ॥
इह लोके च वेदे च श्रुतिरित्थं सदा प्रभो ।
यथा कर्म च कर्ता च पर्यायेणेह संगतौ ॥ १९ ॥
हिन्दी अर्थ
जो पुरुष स्वर्ग और मोक्ष के उपयोगी सम्यग् व्यवहार के लिए
शास्त्रका अनुसरण नहीं करता, उसका सब शिष्ट पुरुष बहिष्कार कर देते हैं और वह दु:ख में
निमग्न हो जाता है । हे प्रभो, इस लोकमें प्रामाणिक पुरूषोंमें और वेदमें सदा इस प्रकार की
प्रसिद्धि है कि कर्म और कर्ता हेतु और फलरूप से संसृष्ट हैं यानी कर्म और कर्ताका कार्य-
कारणभाव है