Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 95, Verses 8–11
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 95, verses 8–11 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 95 · श्लोक 8-11
संस्कृत श्लोक
मेरुमन्दरसंकाशा बहवो जीवराशयः ।
उत्पत्योत्पत्य संलीनास्तस्मिन्नेव परे पदे ॥ ८ ॥
अथानन्ताः स्फुरन्त्येते जायमानाः सहस्रशः ।
नानाककुब्निकुञ्जेषु पादपेष्विव पल्लवाः ॥ ९ ॥
जीवौघाश्चोद्भविष्यन्ति मधाविव नवाङ्कुराः ।
तत्रैव लयमेष्यन्ति ग्रीष्मे मधुरसा इव ॥ १० ॥
तिष्ठन्त्यजस्रं कालेषु त एवान्ये च भूरिशः ।
जायन्ते च प्रलीयन्ते परस्मिञ्जीवराशयः ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
ब्रह्म की उपादानता तो तीनो कालो में उसीमें उत्पन्न होकर लीन होने के कारण सिद्ध है,
ऐसा कहते है ।
मेरू ओर मन्दर के तुल्य बहुत-सी जीवराशियाँ पुनः पुनः उत्पन्न होकर उसी परमतत्त्व
में लीन हो गई है । उसके बाद जैसे विविध दिशाओंमें वृक्षो में पल्लव लगते हैँ वैसे ही ये अनन्त
जीवराशियाँ हजारों की संख्याम उस परमपदमें उत्पन्न होकर स्फुरित होती हैं जैसे वसन्त
ऋतुमें नूतन अंकुर उत्पन्न होते हैं वैसे ही आगे भी उस परमपदमें ये जीवसमूह उत्पन्न होंगे ।
जैसे ग्रीष्म ऋतु में वसन्त ऋतु के रस लीन हो जाते हैं वैसे ही फिर उसीमें लीन हो जायेंगे। वे
ओर अन्य अनेक जीवराशियाँ सदा उस परमपदमे स्थित रहती हैं, उसीसे उत्पन्न होती हैं
और उरीमें लीन हो जाती हैं