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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 95, Verse 36

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 95, verse 36 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 95 · श्लोक 36

संस्कृत श्लोक

कर्मनाशे मनोनाशो मनोनाशो ह्यकर्मता । मुक्तस्यैव भवत्येव नामुक्तस्य कदाचन ॥ ३६ ॥

हिन्दी अर्थ

कर्म का नाश होने पर मनका नाश हो जाता हे, मनका नाश होने पर कर्मका अभाव हो जाता है । योग से जनित तत्त्वसाक्षात्कार से अविद्या का नाश होने पर दोनों का आत्यन्तिक विनाश होता है अन्यथा नहीं होता, इस आशय से कहते हैं । यानी कर्म नाश होने पर मनोनाश या मनोनाश होने पर कर्म का अभाव मुक्तपुरुष का होता है; जो मुक्त नहीं है, उसका कदापि नहीं होता