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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 95, Verse 29

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 95, verse 29 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 95 · श्लोक 29

संस्कृत श्लोक

मानसोऽयं समुन्मेषः कलाकलनरूपतः । एतत्तत्कर्मणां बीजं फलमस्यैव विद्यते ॥ २९ ॥

हिन्दी अर्थ

सहोत्पत्ति पक्षमें भी (कर्ता और कर्मकी साथ उत्पत्ति होती है, इस पक्षमे भी) जैसे कोई दोष न आये वैसा उपपादन करने के लिए भूमिका बोधिते हैं । “यद्धि मनसा ध्यायति तद्वाचा वदति तत्‌ कर्मणा करोति" (जिसका मनसे ध्यान करता है, उसे वाणी से बोलता है, उसे कर्म से करता है) इस श्रुति से मनका क्रियाकौशल-प्रतिसन्धानरूप से जो यह विकास है, वही कर्मोका प्रसिद्ध कारण हे । शंका: क्रियाकौशलरूप से मन का विकास ही कर्मो का कारण है, यह आप कैसे जानते हैं ? समाधान : मन के विकास के बाद ही क्रियासिद्धिरूप फल देखा जाता है, जिसमें मनका सहयोग नहीं है, ऐसी देहचेष्टा का कोई फल नहीं दिखाई देता हे