Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 95, Verses 30–34
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 95, verses 30–34 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 95 · श्लोक 30
संस्कृत श्लोक
यदैव हि मनस्तत्त्वमुत्थितं ब्रह्मणः पदात् ।
तदैव कर्म जन्तूनां जीवो देहतया स्थितः ॥ ३० ॥
कुसुमाशययोर्भेदो न यथा भिन्नयोरिह ।
तथैव कर्ममनसोर्भेदो नास्त्यविभिन्नयोः ॥ ३१ ॥
क्रियास्पन्दो जगत्यस्मिन्कर्मेति कथितो बुधैः ।
पूर्वं तस्य मनो देहं कर्मातश्चित्तमेव हि ॥ ३२ ॥
न स शैलो न तद्व्योम न सोऽब्धिश्च न विष्टपम् ।
अस्ति यत्र फलं नास्ति कृतानामात्मकर्मणाम् ॥ ३३ ॥
ऐहिकं प्राक्तनं वापि कर्म यद्रचितं स्फुरत् ।
पौरुषोऽसौ परो यत्नो न कदाचन निष्फलः ॥ ३४ ॥
हिन्दी अर्थ
मन के विकास के बाद ही फल होता है, यह जो कहा था, उसे उदाहरण द्वारा दशति हैं।
आदि सृष्टि में परमपदरूपी ब्रह्म से जभी मनरूप तत्त्व उत्पन्न हुआ तभी मनरूप
उपाधिवाले आविर्भूत समष्टि व्यष्टि जीवों का कर्म भौ उदित हुआ और जीव प्राक्तन वासना
के अनुसारी देहवाला होने से देहमें अहंभाव से स्थित हुआ । इस विषयमे श्रुति भी
"तन्मनोऽकुरूतात्मन्वी स्यामिति" (उसने मे मनसे मनस्वी होऊँ, इस अभिप्राय से मनकी
रचना की) मन के जन्म के अधीन ही आत्मन्विता से कथित देहित्व ओर संचरण रूप कर्म
दिखलाती है । “यदूयद्भवन्ति तदा भवन्ति यह दूसरी श्रुति भी हे । इससे मन ही कर्ता है,
आत्मा कर्ता नहीं, यह दिखलाने के लिए मैं सहोत्पत्ति यानी पुरुष और कर्म की सहोत्पत्ति पक्ष
दर्शाया है, यह भाव हे