Guru's AddaGuru's Adda

Utpatti Prakarana (Creation) · Sarga 94

तिरानबेवाँ सर्ग समाप्त चौरानबेवाँ सर्ग उपाधि तथा गुणों की विचित्रता से शीघ्र और विलम्ब से मुक्त होनेवाली बारह प्रकार से भिन्न जीवजातियों का वर्णन ।

26 verse-groups

  1. Verse 1किन्हीं जीवों की शीघ्र मुक्ति होती है और किन्‍्हीं की विलम्ब से होती है, इस पूर्वोक्त मुक…
  2. Verses 2–3(१) इदप्रथमता (२) युणपीवरी (3) ससत्वा (४) अधमसत्वा (५) अत्यन्ततामसी (&) राजसी (७) राजससात…
  3. Verse 4तीसरी जीवजाति को कहते है । हे श्रीरामचन्द्रजी, विविध प्रकार के सुख-दुःखरूपी फलों के प्रदा…
  4. Verses 5–6चौथी जीवजाति को कहते है। जो जीवजाति विचित्र संसारकी वासनाओं से युक्त हो, अत्यन्त कलुषित य…
  5. Verse 7पाँचवी जीवजाति को कहते है । पूर्वोक्त लक्षणवाली उत्पत्ति ही यदि अध्यात्मशास्त्रसे विमुख ह…
  6. Verses 8–10छठी जीक्जाति को कहते है । हे नृपश्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजी, पुरुष की जो उत्पत्ति पूर्वकल्प क…
  7. Verse 11आठवीं जीवजाति को दशति हैं । वही यदि उक्त मनुष्यजन्मों से भिन्न यक्ष, गन्धर्व आदि के जन्मो…
  8. Verse 12नर्वीं जीवजाति को दशति है। वही यदि चिरकाल की अभिलाषावाली होने से सैकड़ों जन्मों से मोक्षभ…
  9. Verse 13दसवीं जीवजाति को दशतिहै। यदि वही उत्पत्ति, जिसमें हजारों जन्मों से भी मोक्ष पाने मे सन्दे…
  10. Verse 14ग्यारहवीं जीवजाति को कहते हैं । कल्प के आदि में हिरण्यगर्भमें मनुष्यों की जो उत्पत्ति है,…
  11. Verse 15बारहवीं को कहते हैं। वह तामस उत्पत्ति यदि तामस जन्म से ही मोक्षकी भागिनी हो ओर तामस फल प्…
  12. Verse 16दानव, राक्षस, पिशाच आदि जन्म में सतत्वगुणकी अभिवृद्धि होने से प्रह्माद, कर्कटी आदिकी ज्ञा…
  13. Verse 17जो उत्पत्ति पहले के हजारों जन्मों से युक्त और आगे आनेवाले सैंकड़ों जन्मों से भी मोक्ष के…
  14. Verse 18जो उत्पत्ति पहले लाखों जन्मों से युक्त है और आगे भी लाखों जन्मों से जिसमें मोक्षप्राप्ति…
  15. Verse 19जिसकी परिपूर्णता कुछ प्रचलित हुई है, ऐसे समुद्र से जैसे लहरें उठती हैं, वैसे ही ये सम्पूर…
  16. Verse 20अपने तेज से जिसका कलेवर चंचल हुआ है, तेजःस्वरूप दीपक से जैसे किरणें निकलती हैं, वैसे ही य…
  17. Verses 21–22जैसे प्रज्वलित अग्नि से उसकी ज्वालाओं के बल से उत्पन्न हुई चिनगारियाँ उत्पन्न होती हैं वै…
  18. Verse 23जैसे वृक्ष से वृक्षरूप विविध शाखाएँ उत्पन्न होती हैं वैसे ही ये सम्पूर्ण दृश्यराशियाँ ब्र…
  19. Verse 24हे श्रीरामचन्द्रजी, जैसे सुवर्ण से कड़ा, बाजूबन्द आदि आभूषण उत्पन्न होते हैं वैसे ही सभी…
  20. Verse 25जैसे निर्मलकान्तिवाले झरने से जलबिन्दु निकलते हैं वैसे ही सभी जीवराशियाँ ब्रह्म से उत्पन्…
  21. Verse 26इस प्रकार अंशांशिभाव की कल्पना द्वारा ब्रह्म से जीवों की अभेदयोग्य दिखला कर उपाधिकी असत्य…
  22. Verse 27जैसे जल के सीकर (छोटे छोटे जलबिन्दु), जलभौंरियाँ, लहरें और बड़े जलबिन्दु जलसे ही उत्पन्न…
  23. Verse 28हे श्रीरामचन्द्रजी, जैसे सूर्य के तेजसे मृगतृष्णाकी नदियाँ उत्पन्न होती हैं वैसे ही सम्पू…
  24. Verse 29जैसे चन्द्रमा की चाँदनी चन्द्रमासे पृथक्‌ नहीं है और जैसे तेजकी प्रभा तेजसे भिन्न नहीं हे…
  25. Verses 30–31इस प्रकार ये विविध प्राणियों के वर्ग जिससे उत्पन्न होते हैं, उसीमें उपाधि के लयसे अभेद को…
  26. Verse 32इनमें कोई प्राणिवर्ग चिरकाल से जन्म- मरण आदि भोग रहे हैं और हजारों जन्मों के बाद वे लीन ह…