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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 94, Verses 2–3

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 94, verses 2–3 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 94 · श्लोक 2

संस्कृत श्लोक

इदं प्रथमतोत्पन्नो योऽस्मिन्नेव हि जन्मनि । इदंप्रथमतानाम्नी शुभाभ्याससमुद्भवा ॥ २ ॥ शुभलोकाश्रया सा च शुभकार्यानुबन्धिनी । सा चेद्विचित्रसंसारवासनाव्यवहारिणी ॥ ३ ॥

हिन्दी अर्थ

(१) इदप्रथमता (२) युणपीवरी (3) ससत्वा (४) अधमसत्वा (५) अत्यन्ततामसी (&) राजसी (७) राजससात्विकी (८) राजसराजसी (९) राजसतामसी (१०) राजसात्यन्ततामसी (११) तामसी (१२) तामससत्वा (१३) तमोराजसी ओर (१४) अत्यन्ततामसी आगे कहे जानेवाले इन १४ भेदो मे अन्तिम दो भेदो का पाँचवें और नवे भेद में अन्तर्भाव होने के कारण १२ भेद बचते हैं। उनमें से पहली इदं प्रथमतानामक उत्पत्ति को दशति हैं। जिस जीव को पहले कल्प के अपने अन्तिम जीवजन्म में शम, दम आदि सर्वसाधन गुणसम्पत्ति प्राप्त होने पर भी श्रवण, मनन आदि का लाभ न होने या बलवान्‌ विघ्न रहने से ज्ञान उत्पन्न नहीं हुआ, वह जीव इस कल्प में प्रथम जन्म में ही ज्ञानलाभ के योग्य बनकर उत्पन्न होता है । उस श्रेणी के जीवका वह जन्म इदं -प्रथम नाम से विख्यात होता हे । यह इदंप्रथमता पूर्वकल्प के शुभाभ्यास का फल हे