Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 94, Verses 21–22
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 94, verses 21–22 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 94 · श्लोक 21, 22
संस्कृत श्लोक
स्वतेजःस्पन्दिताभोगाद्दीपादिव मरीचयः ।
सर्वा एव समुत्पन्ना ब्रह्मणो भूतपङ्क्तयः ॥ २१ ॥
स्वमरीचिबलोद्भूता ज्वलिताग्नेः कणा इव ।
सर्वा एवोत्थितास्तस्माद्ब्रह्मणो जीवराशयः ॥ २२ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे
प्रज्वलित अग्नि से उसकी ज्वालाओं के बल से उत्पन्न हुई चिनगारियाँ उत्पन्न होती हैं वैसे
ही ब्रह्म से ये सब प्राणिवर्ग उत्पन्न हुए हैं । जैसे चन्द्रमा के बिम्बसे किरणें निकलती हैं वैसे ही
मन्दारकी मंजरीके सदुश ये सम्पूर्ण जीवराशियाँ उस ब्रह्म से ही उदित हुई हैं