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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 94, Verses 8–10

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 94, verses 8–10 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 94 · श्लोक 8-10

संस्कृत श्लोक

संदिग्धमोक्षा यदि तत्प्रोच्यतेऽत्यन्ततामसी । अनद्यतनजन्मा तु जातिस्तादृशकारिणी ॥ ८ ॥ योत्पत्तिर्मध्यमा पुंसो राम द्वित्रिभवान्तरा । तादृक्कार्या तु सा लोके राजसी राजसत्तम ॥ ९ ॥ अविप्रकृष्टजन्मापि सोच्यते कृतबुद्धिभिः । सा हि तन्मृतिमात्रेण मोक्षयोग्या मुमुक्षुभिः ॥ १० ॥

हिन्दी अर्थ

छठी जीक्जाति को कहते है । हे नृपश्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजी, पुरुष की जो उत्पत्ति पूर्वकल्प की वासनाओंके अनुरूप हो, अतएव वैसे ही कार्य करनेवाली हो, इस कल्पके दो तीन जन्मों के मध्य में मनुष्य आदिरूप हुई हो, तदनुसार स्वर्ग, नरक आदि में पहुँचानेवाली और संदिग्धमोक्षा हो, वह लोकमें "राजसी" कहलाती हे । सातवीं जीक्जाति को दशति दहै। वह उत्पत्ति जब राजस दुःखों के अनुभव से उत्पन्न वैराग्य की समृद्धि से जिसका ज्ञानप्राप्ति योग्य जन्म संनिकट है, ऐसी होती है । महामति मुमुक्षुओं द्वारा उसी जन्म में मरनेमात्रसे वह मोक्षयोग्य कही जाती है । उसको मैने उक्त कार्य हेतुक अनुमान से राजससात्त्विकी कहा हे