Guru's AddaGuru's Adda

Utpatti Prakarana (Creation) · Sarga 92

इक्यानबेवाँ सर्ग समाप्त बानबेवाँ सर्ग पुनः शंका कर मन की अमोघ शक्ति की दृढ़रूप से स्थापना का तथा पुरुषप्रयत्न की दृढता होने पर यथेष्ट कार्याचरण में सामर्थ्य का वर्णन ।

29 verse-groups

  1. Verse 1श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे रघुकुलदीपक, भगवान्‌ ब्रह्माजी ने मुझसे यह सब कहा। मैंने उनके पूर…
  2. Verse 2भगवन्‌, आपने ही शाप, मन्त्र आदि की शक्तियाँ अमोघ हैं, ऐसा कहा है, फिर आपने ही उन्हें मोघ…
  3. Verse 3देखा गया है कि शाप द्वारा और मन्त्र की शक्ति द्वारा प्राणियों के मन, बुद्धि, इन्द्र्यो आद…
  4. Verse 4ऐसा मानने से वरदान एवं शाप के कार्य में विरोध भी आता है, इस आशय से कहते हैं। जैसे ये वायु…
  5. Verse 5देह मनकी अपेक्षा न्यून सत्तावाली है, अतएव उस पर शाप आदि का आक्रमण होने पर भी मन पर शाप आद…
  6. Verses 6–7दोनो में से एक का नाश होने पर दोनों का ही नाश अवश्य होना चाहिए । जैसे मनका विनाश होने पर…
  7. Verse 8पहले विरोध को दूर करने के लिए वर और शाप की प्रबलतोक्तिकी ओत्सर्गिकता बहूधा दष्ट होनेके का…
  8. Verse 9मेरा पूर्व कथन स्थूलका ही विनाश देखा गया है, यूक्ष्मका नहीं, इस लोकढ्ष्ट के अनुसार है, यह…
  9. Verse 10उनमें एक तो मनोमय शरीर है, जो शीघ्र कार्य करनेवाला और सदा चंचल है । दूसरा मांसमय शरीर है,…
  10. Verses 11–13उक्त दो शरीरो में मांसमय शरीर सभी लोगो को प्रत्यक्षरूप से ज्ञात हे । उस पर शाप तथा अभिचार…
  11. Verse 14उसकी स्वाधीनता की, हेतुप्रदर्शनपूर्वक, उपपत्ति करते है । यदि वह अपने पौरूषका आश्रय लेकर औ…
  12. Verse 15जैसे उस पर दुःख का आघात नहीं होता वैसे ही उसकी सुखकी अभिवृद्धि भी बढ़ती है, ऐसा कहते हैं।…
  13. Verse 16मांसमय देह का यह क्रम नहीं है, ऐसा कहते हैं। मांसमय देह का कोई भी पौरुषक्रम सफल नहीं होता…
  14. Verse 17विषयदोष से मन दूषित होता है, अन्य दोष से नहीं, ऐसा कहते हैं। चित्त सदा पवित्र विचार का स्…
  15. Verse 18शरीर जल में, अग्नि में, चाहे कीचड़ में गिर पडे, किन्तु मन जिसका ध्यान करता है, तुरन्त उसी…
  16. Verse 19सम्पूर्ण देह आदि भावों का विनाश होने पर भी प्रयत्न समृद्ध होकर बिना किसी प्रकार की विघ्नब…
  17. Verse 20जब विषयदोष में भी मन की दृढता होने पर दुःखका दर्शन नहीं होता, तब पवित्र विषयमें मनकी दृढत…
  18. Verse 21शूल के अग्रभाग में स्थित माण्डव्य ऋषिने अपने पुरूषप्रयत्न से मनको रागरहित और दुःखशून्य बन…
  19. Verse 22अन्ध कुएँ में गिरे हुए दीर्घतपा नामके ऋषि को मानसिक यज्ञो से स्वर्ग प्राप्त हुआ । ऋषि दीर…
  20. Verses 23–24मनुष्य होते हुए भी इन्दु के पुत्रोने पुरुषोद्योगसे (पौरूषसे) ध्यान द्वारा ब्रह्मता (ब्रह्…
  21. Verse 25जैसे कमलों की चोट पत्थर को नहीं तोड़ सकती वैसे ही मानसिक व्यथाएँ, शाप ओर पापदृष्टिवाले रा…
  22. Verse 26जो कोई (राजा सौदास, नहुष, विश्वामित्र आदि) शाप, काम, क्रोध आदि मानसिक व्यथा रूपी बाणोंसे…
  23. Verse 27विवेक और पौरुष से दृढ़ मनमें तो इच्छित पदार्थ की क्षति नहीं होती, ऐसा कहते हैं । इस संसार…
  24. Verse 28इसलिए पुरूष इस संसार में पुरूषप्रयत्न के साथ मन से ही मन को, अपने से ही अपने को पवित्र मा…
  25. Verses 29–31हे मुनिजी, जो वस्तु मन को प्रतिभासित होती है, वही अत्यन्त यथार्थ-सी ही होती है । एक क्षण…
  26. Verse 32यदि कोई कटे कि ऐन्दवों का पूर्वतन मनुष्य आदि भावका प्रतिभास भी तो दृढ़ रहा, अतः उनकी मनुष…
  27. Verse 33सृष्टिकर्तृत्व की तरह सृष्टिभोक्तृत्व भी मनमें ही है, ऐसा कहते हैं- यह मन भावना से जिसे द…
  28. Verse 34पूर्वोक्त अर्थ को उदाहरण द्वारा दशति हैं। अनुसन्धान यानी भोक्ता के अदृष्ट से उदूबोधित संस…
  29. Verses 35–37भोक्ता के अदृष्ट से उद्बोधित संस्कार का अनुसारी चित्त क्षार मिट्टी में रसायन को (मधुर आदि…