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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 92, Verses 6–7

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 92, verses 6–7 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 92 · श्लोक 6,7

संस्कृत श्लोक

एकनाशे द्वयोरेव नाशोऽत्राभ्युपपद्यते । अवश्यं भवितुं मनोनाशे देहपरिक्षयः ॥ ६ ॥ मनः शापादिभिर्दोषैः कथं नाक्रम्यते प्रभो । कथमाक्रम्यते वापि ब्रूहि मे परमेश्वर ॥ ७ ॥

हिन्दी अर्थ

दोनो में से एक का नाश होने पर दोनों का ही नाश अवश्य होना चाहिए । जैसे मनका विनाश होने पर देहका नाश देखा जाता है, वैसे ही देहका नाश होने पर मन का विनाश भी हो सकता है, इस प्रकार देह की मनकी अपेक्षा न्यून सत्ता सिद्ध नहीं होती बल्कि नेत्र आदि से अदृश्य होने पर प्रत्यक्षका विषय होनेसे स्वप्न आदि के समान मनकी ही देह की अपेक्षा न्यून सत्ता सिद्ध होती है, यों रज्जु का विनाश होने पर सर्पं की अवस्थिति की भाँति देह का विनाश होनेसे मनकी अवस्थिति का सम्भव नहीं हे, यह भाव हे । हे प्रभो, मन शाप आदि दोषों से कैसे आक्रान्त नहीं होता अथवा कैसे आक्रान्त होता है ? हे परमेश्वर, यह आप कृपापूर्वक मुझसे कहिए