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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 92, Verses 11–13

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 92, verses 11–13 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 92 · श्लोक 11-13

संस्कृत श्लोक

तत्र मांसमयः कायः सर्वस्यैव च संगतः । सर्वैराक्रम्यते शापैस्तथा विद्यादिसंचयैः ॥ ११ ॥ मूकप्रायो ह्यशक्तोऽसौ दीनः क्षणविनश्वरः । पद्मपत्राम्बुचपलो दैवादिविवशस्थितिः ॥ १२ ॥ मनोनाम द्वितीयोऽयं कायः कायवतामिह । स आयत्तोऽपि नायत्तो भूतानां भुवनत्रये ॥ १३ ॥

हिन्दी अर्थ

उक्त दो शरीरो में मांसमय शरीर सभी लोगो को प्रत्यक्षरूप से ज्ञात हे । उस पर शाप तथा अभिचार आदि कृत्या, शस्त्र, अस्त्र, विषआदि का आक्रमण होता हे । यह मांसमय शरीर मूकप्राय, असमर्थ, दीन-हीन, क्षणमें नष्ट होनेवाला, पद्मपत्र में स्थित जल के समान चंचल तथा दैव (प्राक्तन कर्म) आदिके कारण स्थित हे । यहाँ पर प्राणियों का मननामक दूसरा जो यह शरीर है, वह तीनों लोकों में प्राणियों का स्वाधीन होता हुआ भी स्वाधीन नहीं हे