Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 92, Verse 32
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 92, verse 32 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 92 · श्लोक 32
संस्कृत श्लोक
अनुसंधानमात्रेण सूर्यबिम्बेऽपि यामिनीम् ।
मनः पश्यत्यशुद्धाक्षश्चन्द्रबिम्बे द्वितामिव ॥ ३२ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि कोई कटे कि ऐन्दवों का पूर्वतन मनुष्य आदि भावका प्रतिभास भी तो दृढ़ रहा, अतः
उनकी मनुष्यादिभाव में स्थिति क्यो नहीं हुई ? उस पर कहते है ।
जैसे कुलाल की (कुम्हार की) घटनिर्माणक्रिया के अनन्तर घडा अपनी मृत्पिण्डदशा का
त्याग कर देता हे, वैसे ही पुरुष उत्तर पदार्थ की वासना के अनन्तर ही पूर्व की स्थिति का त्याग
कर देता हे । भाव यह कि आगे की दुढवासना से पिछली वासना का विनाश हो जाता है ॥ ३ ०॥
यदि कोई कहे पूर्ववासना के नाश से क्षीण हुई उपासना कैसे अन्य कार्य को कर सकती
है ? तो इस पर कहते हैं।
हे मुनिजी, जैसे चंचल जल क्षणभरमें ऊँची तरंगके रूप में प्राप्त होता है, वैसे ही स्पन्दमात्र
मन एक क्षण में ही भावितपदार्थता को प्राप्त होता है । विरोधीका विनाश करने तक ही अपने
कार्य में विलम्ब होता है, उसके बाद तो कोई विघ्न न रहने से एक क्षण में उपासनाजनित
वासना के विषयीभूत पदार्थता को प्राप्त होता है, इसलिए उसका नाश नहीं होता ॥ ३ १॥
यदि ऐसा है तो प्रलयकालमें आपके विरुद्ध सृष्टि की कल्पना कैसे हुई ? इस पर कहते हैं ।
जिस पुरूष के नेत्र में विकार है, यानी जिसने अपनी अंगुलीसे दृष्टि बन्द की है (आँख को
दबाई है), उसे जैसे दो चन्द्र देखने का अनुभव होता है, वैसे ही मन केवल अनुसन्धान से सूर्य
के बिम्ब में भी रात्रि को देखता है ([))