Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 92, Verse 22
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 92, verse 22 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 92 · श्लोक 22
संस्कृत श्लोक
अन्धकूपस्थितेनापि मानसैर्यज्ञसंचयैः ।
ऋषिणा दीर्घतपसा संप्राप्तं वैबुधं पदम् ॥ २२ ॥
हिन्दी अर्थ
अन्ध कुएँ में गिरे हुए दीर्घतपा नामके ऋषि को मानसिक यज्ञो से स्वर्ग प्राप्त हुआ । ऋषि
दीर्घतपा भी यज्ञ करनेकी इच्छासे यज्ञ की सामग्रीका संग्रह करने के लिए आश्रम से निकले ।
अकस्मात् किसी अन्धे कुएँ में गिर पड़े । वहाँ यज्ञकाल के अतिक्रमण का प्रसंग होने पर मन से
ही उन्होने यज्ञ किया । उससे इन्द्र प्रसन्न हुए । उन्हें कुएँ से निकालकर अपने लोक को ले
गये । यह कथा महाभारत मेँ प्रसिद्ध है