Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 92, Verses 35–37
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 92, verses 35–37 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 92 · श्लोक 35
संस्कृत श्लोक
प्रतिभानुपदं चेतः क्षारेऽपि हि रसायनम् ।
दृष्ट्वा पीत्वा परां तृप्तिं याति वल्गति नृत्यति ॥ ३५ ॥
प्रतिभानुपदं चेतो व्योमन्यपि महावनम् ।
दृष्ट्वा लुनाति लूत्वा च पुनरारोपयत्यलम् ॥ ३६ ॥
इत्थं यदेव परिकल्पयतीन्द्रजालं क्षिप्रं तदेव परिपश्यति तात चेतः ।
नासज्जगन्न च सदित्यवगम्य नूनं लूनां दृशं विविधभेदवतीं जहीहि ॥ ३७ ॥
हिन्दी अर्थ
भोक्ता के अदृष्ट से उद्बोधित संस्कार का
अनुसारी चित्त क्षार मिट्टी में रसायन को (मधुर आदि विविध रसों को) देखकर ओर उनका
पानकर परमतृप्ति को प्राप्त होता है, मारे हर्ष के प्रसन्न होता है और नाचता हे । ऊँट, बकरी
आदि आक, नींव आदि के पत्ते भी बड़े चाव से खाते देखे जाते हैं