Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 92, Verse 4

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 92, verse 4 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 92 · श्लोक 4

संस्कृत श्लोक

यथैतौ पवनस्पन्दौ यथा स्नेहतिलौ यथा । अभिन्नौ तद्वदेवैतौ मनोदेहौ स एव तत् ॥ ४ ॥

हिन्दी अर्थ

ऐसा मानने से वरदान एवं शाप के कार्य में विरोध भी आता है, इस आशय से कहते हैं। जैसे ये वायु और स्पन्दन अभिन्न हैं, तेल और तिल अभिन्न हैं और जैसे अग्नि और उष्णता अभिन्न हैँ वैसे ही मन और देह भी अभिन्न ही हैँ, क्योंकि मन ही तो देह है। तात्पर्य यह है कि मन पर ही यदि वरदान या शाप का आक्रमण नहीं होता है, तो उससे अभिन्‍न देहमें भी उसका आक्रमण नहीं होना चाहिए