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Utpatti Prakarana (Creation) · Sarga 7

छठा सर्ग समाप्त सातवाँ सर्ग हिरण्यगर्भ आदि जगत्‌का मूल कारणभूत जिस देवाधिदेव का पहले वर्णन हो चुका है, सम्पूर्ण उपाधियों से शून्य उसके तत्त्व का वर्णन ।

24 verse-groups

  1. Verse 1प्रस्ताव द्वारा जिज्ञासित साधन के ज्ञात होने पर प्रस्तुत जगत्कारण के वास्तविक स्वरूप को ज…
  2. Verse 2श्रीवसिष्ठजी ने कहा : भ्‌ यह नहीं हो सकता, इस प्रकार का वैराग्य उद्विग्नता है, उसके त्याग…
  3. Verse 3शका- क्या वह देह से परिच्छिन्नही है ? समाधान - नहीं, वह सर्वव्यापक विश्वरूप है । सम्पूर्ण…
  4. Verse 4केवल कार्यात्मक विश्व ही उससे पृथक्‌ नहीं है, यह बात नहीं है, किन्तु विश्व की कारण माया भ…
  5. Verse 5चिन्मात्र का (चेतनाश्रय) विश्व यह अर्थ होता है । वह लोकमें सबको भलीभाँति विदित है और वही…
  6. Verses 6–7यह कर्ता क्विप प्रत्यय नहीं है, किन्तु भाव में (चेतनम्‌-चित्‌-ज्ञान) क्विप्‌ प्रत्यय है।…
  7. Verse 8यदि कोई कहे कि जीव मूर्तस्थूल शरीर से अतिरिक्त है । मूर्तस्थुलशरीरातिरिक्तत्वेन उसके ज्ञा…
  8. Verse 9-अशरीरम्‌“ इत्यादि पूर्वोक्त श्रुति का तो-स्थूल, सूक्ष्म और कारण नामक तीन देहों से रहित क…
  9. Verse 10इस विषय में श्रुतिरूप प्रमाण उपस्थित करतेहै। उस परब्रह्म परमात्मा का साक्षात्कार होने पर…
  10. Verse 11यदि ऐसी बात है, तो चित्तनिरोधरूप योग से ही जीव की चेत्य पदार्थों की ओर प्रवणता रोकी जा सक…
  11. Verse 12इसी प्रकार ज्ञान के बिना मोक्ष भी दुर्लभ है, ऐसा कहते हैं। जो मोक्षनामक अचेत्य चित्स्वरूप…
  12. Verse 13श्रीरासचन्द्रजी के निम्ननिर्दिष्ट दोनों प्रश्नलोक असंगत हैं, ऐसी किसीको शंका हो सकती है,…
  13. Verse 14यानी उसका संसारकोटि में समावेश है या आत्मकोटि में ? यह अर्थ है । ब्रह्मन्‌ यदि जीव का संस…
  14. Verses 15–17आपका यह कथन ठीक होता, यदि जीव ही संसारी होता और जीव ही अपने ज्ञान से मुक्त होता अथवा जीव…
  15. Verse 18यों जब श्रीरामचन्द्रजी की शंका का समाधान हो चुका, तब वे सर्ग के आरम्भमें जो प्रश्न किया थ…
  16. Verses 19–20निर्विषय ज्ञान अप्रसिद्ध है, अतः वह निर्विषय, अनावृत्त ओर अपरोक्ष चिद्रूप है, ऐसा कहनेपर…
  17. Verses 21–25उक्त को ही पुनः स्पष्ट करते हैं। जिसमें द्रष्टा, दर्शन, दृश्य ये सम्पूर्ण क्रम रहते हुए भ…
  18. Verse 26जो वस्तु प्रमाणो द्वारा जैसे जानी जाती है उसकी वैसी ही सत्ता होती है, अन्य रूपसे नहीं ब्र…
  19. Verses 27–30ब्रह्म प्रमाणों द्वारा नहीं ज्ञात होता“ इस कथन की सिद्धि नहीं होती, क्योकि यदि प्रतिबन्धक…
  20. Verse 31शंका - जव द्वैत का प्रतिबिम्ब नहीं पडता उस अवस्थामे उक्त बुद्धिमें ब्रह्म का प्रतिबिम्ब प…
  21. Verses 32–34अपने मन में कुछ विशेष बात को रखकर श्रीरामचन्द्रजी दूसरा प्रश्न उठाते है । श्रीरामचन्द्रजी…
  22. Verses 35–36जैसा कि ऊपर कहा गया है, सूक्ष्म चिन्मात्र ब्रह्म में विशाल जगत्‌ का अध्यास होना सरसों के…
  23. Verses 37–41दूसरे प्रकार से भी दश्यके परिमार्जनकी प्रतिज्ञा करते है । हे श्रीरामजी, दृश्य के अत्यन्त…
  24. Verses 42–45का पुत्र नहीं हे, जैसे मरूभूमि में जल नहीं है ओर जैसे आकाश में वृक्ष नहीं हे, वैसे ही जगद…