Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 7, Verses 32–34
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 7, verses 32–34 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 7 · श्लोक 32
संस्कृत श्लोक
श्रीराम उवाच ।
इयतो दृश्यजातस्य ब्रह्माण्डस्य जगत्स्थितेः ।
मुने कथमसत्तास्ति क्व मेरुः सर्षपोदरे ॥ ३२ ॥
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
दिनानि कतिचिद्राम यदि तिष्ठस्यखिन्नधीः ।
साधुसंगमसच्छास्त्रपरमस्तदहं क्षणात् ॥ ३३ ॥
प्रमार्जयामि ते दृश्यं बोधे मृगजलं यथा ।
दृश्याभावे द्रष्टृता च शाम्येद्बोधोऽवशिष्यते ॥ ३४ ॥
हिन्दी अर्थ
अपने मन में कुछ विशेष बात को रखकर श्रीरामचन्द्रजी दूसरा प्रश्न उठाते है ।
श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : भगवन्, इतने बडे ब्रह्माण्डरूप दश्यसमूह की असत्ता कैसे हो
सकती है, हाँ; जैसे कि आपने कहा वह हो सकता, यदि ब्रह्म मे जगत् अध्यस्त होता । परन्तु
ब्रह्म मेँ जगत् का अध्यास ही नहीं बन सकता, क्योकि चिन्मात्ररूप होनेसे सूक्ष्म ब्रह्म में इतने
बड़े ब्रह्माण्डों से विस्तृत स्थूल प्रपंच का अध्यास होना असंभव है, क्या कहीं सरसों के अन्दर
मेरु पर्वत समा सकता है ?