Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 7, Verses 21–25

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 7, verses 21–25 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 7 · श्लोक 21-25

संस्कृत श्लोक

द्रष्टृदृश्यक्रमो यत्र स्थितोऽप्यस्तमयं गतः । यदनाकाशमाकाशं तद्रूपं परमात्मनः ॥ २१ ॥ अशून्यमिव यच्छून्यं यस्मिन्शून्यं जगत्स्थितम् । सर्गौघे सति यच्छून्यं तद्रूपं परमात्मनः ॥ २२ ॥ यन्महाचिन्मयमपि बृहत्पाषाणवत्स्थितम् । जडं वा जडमेवान्तस्तद्रूपं परमात्मनः ॥ २३ ॥ सबाह्याभ्यन्तरं येन सर्वं संप्राप्य संगमम् । स्वरूपसत्तामाप्नोति तद्रूपं परमात्मनः ॥ २४ ॥ प्रकाशस्य यथालोकः शून्यत्वं नभसो यथा । तथेदं संस्थितं यत्र तद्रूपं परमात्मनः ॥ २५ ॥

हिन्दी अर्थ

उक्त को ही पुनः स्पष्ट करते हैं। जिसमें द्रष्टा, दर्शन, दृश्य ये सम्पूर्ण क्रम रहते हुए भी नित्य अस्त को प्राप्त हो जाते हैं, जो आकाश न होता हुआ भी अपरिच्छिन्न होने से आकाश से उपमित होता है, वह परमात्मा का रूप है । जगत्‌-स्वभाव से शून्य होता हुआ भी जो सम्पूर्ण पदार्थों के याथात्म्यभूत स्वरूप से पूर्ण होने के कारण अशून्य-सा है, अविद्यमान भी जगत्‌ जिसमें स्थित है यानी सद्भाव को प्राप्त हुआ है तथा विविध सृष्टियाँ जिसके प्रवाह हैं, ऐसे अज्ञान के रहने पर जो विद्यमान होता हुआ भी उपयोग न होने के कारण शून्य की नाई स्थित है, वह परमात्मा का स्वरूप है। महाचिन्मय होने से यानी महाचित्प्रचुर होने से जो अस्थूल आदि धर्मवाला है, फिर भी अज्ञानी लोगों की दृष्टि में पाषाण की नाई स्थूल है, जो अजड होता हुआ भी जड़ की भाँति अन्दर स्थित है, वह परमात्मा का स्वरूप है । बाह्य यानी अधिभूत ओर अधिदैव तथा आभ्यन्तर यानी अध्यात्म- जो जो पदार्थ प्रसिद्ध है, उनसे युक्त सम्पूर्णं जगत्‌ जिससे आद्यासित तादात्म्यसम्बन्ध को प्राप्तकर सत्‌-असत्‌ इस प्रकार की व्यवहारयोग्यतारूप स्वरूपसत्ता को प्राप्त होता है, वह परमात्मा का स्वरूप हे । जैसे प्रकाश का आलोक ओर आकाश का शून्यत्व आत्मरूप से स्थित हे, वैसे ही यह जगत्‌ जिसमें स्थित है अर्थात्‌ जो इस जगत्‌ का आत्मरूप है, वह परमात्मा का रूप हे