Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 7, Verse 9
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 7, verse 9 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 7 · श्लोक 9
संस्कृत श्लोक
चेत्यनिर्मुक्तता या स्यादचेत्योन्मुखताथवा ।
अस्य सा भरितावस्था तां ज्ञात्वा नानुशोचति ॥ ९ ॥
हिन्दी अर्थ
-अशरीरम्“ इत्यादि पूर्वोक्त श्रुति का तो-स्थूल, सूक्ष्म और कारण नामक तीन देहों से
रहित को परिय ओर अप्रिय स्पर्श नहीं करते, ऐसा अर्थ नहीं है, कारण कि स्वप्न में स्थूल
देहका अभाव होने पर भी प्रिय ओर अप्रिय देखे जाते हैं, यह अभिप्राय है ।
किस प्रकारके जीव के ज्ञान से कृतार्थता होती है ? ऐसा यदि कोई प्रश्न करे तो उसपर
कहते हैं।
चेत्य (दृश्य) पदार्थों से जो सर्वथा मुक्तता (छुटकारा पाना) है अथवा जो अचेत्य (चेतनीय
से भिन्न) पदार्थ की ओर प्रवणता (आकर्षण) है, (>) वह जीव की पूर्णावस्था है, उसको
जानकर जीव फिर शोक नहीं करता