Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 7, Verse 2
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 7, verse 2 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 7 · श्लोक 2
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
य एष देवः कथितो नैष दूरेऽवतिष्ठते ।
शरीरे संस्थितो नित्यं चिन्मात्रमिति विश्रुतः ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीवसिष्ठजी ने कहा :
भ् यह नहीं हो सकता, इस प्रकार का वैराग्य उद्विग्नता है, उसके त्याग द्वारा ।
त) आत्मा को उद्देश्य करके प्रवृत्त विद्या (ज्ञान) अध्यात्मविद्या है ।
हे रघुकुलदीपक, जिस देवाधिदेव का मैंने वर्णन किया है, वह दूर नहीं रहता । चैतन्यमात्ररूप
से विख्यात वह नित्य शरीर में ही (४६) स्थित है । चिन्मात्र यह सम्पूर्ण विश्व है