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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 7, Verse 13

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 7, verse 13 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 7 · श्लोक 13

संस्कृत श्लोक

श्रीराम उवाच । यस्मिञ्जीवे हि विज्ञाते न विनश्यति संसृतिः । व्योमरूपी पशुस्त्वज्ञः स ब्रह्मन्कुत्र कीदृशः ॥ १३ ॥

हिन्दी अर्थ

श्रीरासचन्द्रजी के निम्ननिर्दिष्ट दोनों प्रश्नलोक असंगत हैं, ऐसी किसीको शंका हो सकती है, क्योकि “चेतनं राम संसारोजीव एष पशु:स्मृत:” इस श्लोक में जीव के स्वरूप का और उसके आधार मन के मूल कारण का प्रतिपादन पहले हो चुका है, इसलिए पहले श्लोक के लिए २ जीव की चेत्यनिर्मुक्तता मुक्त्यावस्था में होती है और अचेत्योन्मुखता समाधि-अवस्था में होती है। अवकाश नहीं है औरब्रह्म का स्वरूप इस सर्ग के प्रथम श्लोकमें पूछा गया है, इसलिए ब्रह्मस्वरूप के प्रश्न के लिए कहा गया दूसरा श्लोक भी निरवकाश है। हाँ ठीक है, जैसे प्रश्न सरसरी दृष्टि से प्रतीत होता है, वैसा श्रीरामचन्द्रजीको अभिप्रेत नहीं है, किन्तु यह आक्षेप है उनका आशय यह है कि जीव ही संसार है“ यह कथन व्याहत है, क्योकि जीवको ब्रह्मप्राप्ति होने पर ब्रह्म भी संसारी हो जायेगा । यदि जीवको ब्रह्म प्राप्ति नहीं हुई, तो ब्रह्मप्राप्ति के साधन ज्ञान, शास्त्र आदि व्यर्थ हो जायेंगे । इसलिए जीवका रूप अन्य (संसार से अतिरिक्त) ही कहना चाहिए । दूसरी बात यह है कि जीव का आधार ब्रह्म ही है या अन्य कोर ? प्रथम पक्ष में ज्ञान द्वारा ब्रह्म में अध्यस्त सम्पूर्ण द्वैत के साथ ब्रह्म का भी बाध होने पर वरघातन्याय प्राप्त होगा। दूसरे पक्ष में अद्वैत ब्रह्म का व्याघात होगा, यों समझ रहे श्रीरामचन्द्रजी बोले : ब्रह्मन्‌, जिस जीव के ज्ञान होने पर संसार का विनाश नहीं होता आकाश के समान कल्पित रूपवाला, बहिर्मुख होने के कारण विषयों को ही सार समञ्जनेवाला तथा अज्ञानी वह जीव किस आधार में स्थित है ? ओर कैसा है ?